योग का सांस्कृतिक अनुकूलन और सांस्कृतिक विनियोगः एक डीकॉलोनियल अध्ययन

सारांश :- 

योग भारतीय सभ्यता की एक प्राचीन, सुदृढ़ और निरन्तर विकसित होती हुई ज्ञान-परम्परा है। समकालीन वैश्विक सन्दर्भ में योग के तीव्र प्रसार ने दो समानान्तर प्रक्रियाओं को जन्म दिया है सांस्कृतिक अनुकूलन और सांस्कृतिक विनियोगा जहाँ सांस्कृतिक अनुकूलन योग को विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भों में प्रासंगिक बनाए रखता है, वहीं सांस्कृतिक विनियोग योग को उसके दार्शनिक, ऐतिहासिक और नैतिक आधारों से पृथक कर एक उपभोग्य उत्पाद में परिवर्तित कर देता है। यह शोध-पत्र डीकॉलोनियल दृष्टिकोण के माध्यम से यह तर्क प्रस्तुत करता है कि आधुनिक योग-विमर्श ओपनिवेशिक ज्ञान-संरचनाओं और नव-उदारवादी बाज़ार ताँ से गहराई से प्रभावित है। अध्ययन का उद्देश्य योग को केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि एक समग्र भारतीय ज्ञान-प्रणाली के रूप में पुनस्र्थापित करना है।

 

मुख्य शब्द :- योग, सांस्कृतिक अनुकूलन, सांस्कृतिक विनियोग, डीकॉलोनियल अध्ययन, भारतीय ज्ञान-परम्परा।

 

भूमिका :- 

योग दक्षिण एशियाई सभ्यता के बौद्धिक और सांस्कृतिक इतिहास में एक केन्द्रीय स्थान रखता है। वैदिक तप, उपनिषदिक आत्मान्वेषण, श्रमण ध्यान-परम्पराएँ तथा पतंजलि द्वारा सूत्रबद्ध योग-दर्शन- इन सभी के माध्यम से योग ने विभिन्न ऐतिहासिक चरणों में स्वयं को विकसित किया है। इक्कीसर्वी शताब्दी में योग ने अभूतपूर्व वैश्विक स्वीकृति प्राप्त की है और आज वह स्वास्थ्य, जीवन-शैली, मनोचिकित्सा, खेल-विज्ञान तथा वैकल्पिक चिकित्सा का एक महत्त्वपूर्ण घटक बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस इस वैश्विक मान्यता का प्रतीक है। किन्तु योग के इस वैश्वीकरण ने कुछ गम्भीर बौद्धिक और वैचारिक प्रश्न भी उत्पन्न किए हैं। समकालीन वैश्विक योग प्रायः अपने दार्शनिक आधार, नैतिक अनुशासन और सांस्कृतिक स्मृति से कटा हुआ प्रतीत होता है। योगासन को यम, नियम, ध्यान और मोक्ष-साधना से अलग कर एक तकनीकी व्यायाम के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस सन्दर्भ  में यह प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि क्या योग का यह वैश्विक रूपान्तरण सांस्कृतिक अनुकूलन का उदाहरण है या फिर सांस्कृतिक विनियोग का।

यह शोध-पत्र इसी प्रश्न का समालोचनात्मक विश्लेषण करता है और डीकॉलोनियल अध्ययन के माध्यम से योग के समकालीन स्वरूप को समझने का प्रयास करता है।इस अध्ययन की केन्द्रीय समस्या योग की दो अतिवादी व्याख्याओं में निहित है। एक ओर औपनिवेशिक और आधुनिकतावादी दृष्टिकोण योग को अवैज्ञानिक, रहस्यमय और आधुनिक समाज के लिए अनुपयुक्त मानते हैं; दूसरी ओर नत्र-उदारवादी विमर्श योग को केवल शारीरिक स्वास्थ्य और उपभोग संस्कृति तक सीमित कर देता है। दोनों ही दृष्टियाँ योग की समग्र सभ्यतागत प्रकृति को नकारती हैं। इस शोध के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है –

() योग के ऐतिहासिक और सभ्यतागत विकास को स्पष्ट करना,

() सांस्कृतिक अनुकूलन और सांस्कृतिक विनियोग की अवधारणाओं का सैद्धान्तिक विवेचन करना,

() योग की औपनिवेशिक व्याख्याओं का आलोचनात्मक विश्लेषण करना

() डीकॉलोनियल दृष्टि से योग को एक समग्र ज्ञान-प्रणाली के रूप में पुनर्परिभाषित करना

यह अध्ययन गुणात्मक, व्याख्यात्मक तथा अन्तर्विषयी शोध-पद्धति पर आधारित है। इसमें उपनिषद, पतंजलि योगसूत्र, हठयोग एवं तान्त्रिक ग्रंथों जैसे प्राथमिक स्रोतों का विश्लेषण किया गया है। द्वितीयक सोतों में आधुनिक योग-अध्ययन, औपनिवेशिक इतिहास, सांस्कृतिक अध्ययन तथा डीकॉलोनियल सिद्धान्तों से सम्बन्धित साहित्य सम्मिलित है। शोध में पाठ-विश्लेषण, ऐतिहासिक व्याख्या और विमर्श-विश्लेषण (Discourse Analysis) का प्रयोग किया गया है। डीकोलोनियल दृष्टिकोण इस शोथ का सैद्धान्तिक आधार है, जो पश्चिमी आधुनिकता को सार्वभौमिक मानने की प्रवृत्ति को चुनौती देता है और भारतीय ज्ञान-परम्परा की बौद्धिक स्वायत्तता को रेखांकित करता है।

 

योग  एक सभ्यतागत ज्ञान-प्रणाली :- 

योग को केवल आध्यात्मिक या धार्मिक साधना के रूप में समझना उसके ऐतिहासिक स्वरूप को सीमित करना है। वास्तव में योग एक समग्र सभ्यतागत ज्ञान-प्रणाली है, जो शरीर, मन, नैतिकता और चेतना के बीच सन्तुलन स्थापित करती है। ऋग्वेद में तप और ध्यान, उपनिषदों में आत्मविद्या तथा श्रमण परम्पराओं में ध्यान साधना योग की प्रारम्भिक अभिव्यक्तियाँ है।

 

पतंजलि द्वारा योग की परिभाषा : चित्तवृत्ति निरोध

योग को मानसिक अनुशासन और बौद्धिक साधना का मार्ग बनाती है। मध्यकालीन हठयोग और तन्त्र परम्पराओं ने शरीर को साधना का केन्द्र बनाया, जो उस युग के सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ में योग का एक महत्त्वपूर्ण अनुकूलन था। यह ऐतिहासिक विकास दर्शाता है कि योग कभी स्थिर नहीं रहा, बल्कि प्रत्येक युग में उसने नए अर्थ ओर रूप ग्रहण किए।

 

योग की आन्तरिक अनुकूलन :-

योग परम्परा की एक प्रमुख विशेषता उसकी आन्तरिक लचीलापन और संवादशीलता है। योग ने वैदिक-ब्राह्मण परम्परा, बौद्ध और जैन चिन्तन, तान्त्रिक साधनाओं तथा भक्ति आन्दोलनों के साथ निरन्तर संवाद किया। आधुनिक काल में स्वामी विवेकानन्द ने योग को सार्वभौमिक मानवता और तर्कबुद्धि से जोड़ा, महात्मा गांधी ने उसे नैतिक आत्मसंयम का मार्ग माना, और श्री अरविन्द ने योग को चेतना के उत्क्रांति-मार्ग के रूप में व्याख्यायित किया। आज योग अपने इन अभिनव प्रयोग के रास्ते विश्वव्यापी हो गया है यूरोप, अमेरिका, अरब देश चीन, जापान हर जगह योग- हठयोग, कुण्डलिनी योग, विन्यासयोग, अयंगकर योग, विपस्सना, प्रेक्षा-ध्यान पतंजलि योग के माध्यम से प्रसारित हो रहा है।

यूरोप में योग 1960-70 के बीच हिप्पी आन्दोलन, इस्टर्न सपीरिचुअल और भारत यात्रा के रुझान से प्रसारित हुआ है. लगभग 5 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी रूप में में. योग से जुड़े हुए है। योग स्कूलो, अस्पतालो जेलों, सेना, कारपोरेट सेक्टर और खेल प्रशिक्षण में शामिल की जा रही हैं।

 

बेदान्त और योग दर्शन का प्रभाव :- 

लावत्स्की, जीन हर्बर्ट जैसे विद्वानों पर पड़ा अके भगवद्‌गीता तथा उपनिषदों के अनुवाद ने योग दर्शन की वैचारिक पृष्टभूमि तैयार किया आज फ्रांस के युवा में भारतीय ध्याम, प्राणायाम और साहाना के प्रति सगन बढ़ा है। पेरिस में हजारो योग स्टूडियों है। ल्योन शहर ध्यान और रिट्रीट्स के लिए प्रसिद्ध है। मासेय समुद्री योग और वेलनेस हब के लिए प्रसिद्ध है। फ्रांसिसी चिकित्सा प्रणाली में योग थेरेपी का समावेश हो रहा है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ तनाव, चिंता, अनिद्रा आदि के उपचार  योग की अनुशंसा करते हैं।योगदिवस पर भारतीय दुतावास पेरिस द्वारा एफिल टावर लघु संग्रहालय और रोन नदी के किनारे आयोजित योग सत्र में हजारो प्रतिभागी शामिल होते हैं। फ्रांस में इंस्टिट्यूट फ्रांसिस द योग’ राष्ट्रीय स्तर पर योग प्रशिक्षण प्रदान करता है। इसके साथ सम्बद्ध ‘फेडरेशन नेशनल देस इन्हेलेटस द योगा’ योग शिक्षकों का राष्ट्रीय संघ है। सोवियत संघ में धर्म और अध्यात्म के प्रति शंका का वातावरण थी 1980 कुछ खेल और विशेषयों ने योग को एक शारिरीक और मानसिक अनुशासन के रूप में स्वीकार किया। भारत से आये साहित्य- गीता, योगसूत्र, हठ योग प्रक्षिपिक के एसी भाषा में अनुवाद हुआ फलतः 1931 से परिवर्तन का दौर आया भारतीय योग गुरुओ। अयंगर शिवानन्द, महेशयोगी) की शिक्षाको के प्रभात से रूस में भारतीय दूतानास और संस्कृति केन्द्रों के माध्यम से योग कार्यशालाएँ प्रारम्भ हुई। भारको और सेन्टपीटर्स नवर्ग में लगभग 1000 से अधिक स्टूडियोज है रूस में लगभग 20-25 लाख लोग योग का नियमित अभ्यास करते हैं। रुसी योगगुरू आन्द्रेई सिडएिको द्वारा योग प्रणाली विकसित की गई है।

ये सभी उदाहरण सांस्कृतिक अनुकूलन के हैं, जहाँ योग ने अपने मूल को छोड़े बिना नए सामाजिक सन्दर्भों में स्वयं को स्थापित किया गया है कि योग एक जीवंत, ऐतिहासिक और सभ्यतागत ज्ञान-प्रणाली है, जिसकी अनुकूलनशीलता उसकी शक्ति रही है। किन्तु आधुनिक वैश्विक सन्दर्भ में जब यह अनुकूलन सन्दर्भ-विच्छेदन में बदल जाता है, तब सांस्कृतिक विनियोग की समस्या उत्पन्न होती है। अगले भाग में सांस्कृतिक अनुकूलन और विनियोग की सैद्धान्तिक विवेचना आधुनिक और वैश्विक सन्दर्भों में की जाएगी ।

सांस्कृतिक अनुकूलन :-

सांस्कृतिक अनुकूलन (Cultural Adaptation) वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से कोई ज्ञान-परम्परा नए भौगोलिक, सामाजिक और ऐतिहासिक सन्दर्भों में प्रवेश करते हुए स्वयं को पुनर्संरचित करती है, किन्तु अपने मूल तात्त्विक आधार को पूर्णतः त्यागती नहीं है। मानव-विज्ञान और सांस्कृतिक अध्ययन में इसे जीवंत परम्पराओं की स्वाभाविक विशेषता माना गया है। अनुकूलन का अर्थ न तो शुद्ध संरक्षण है और न ही पूर्ण परिवर्तन, बल्कि निरन्तर संवाद और पुनर्व्याख्या है।

योग के सन्दर्भ में सांस्कृतिक अनुकूलन का अर्थ यह है कि योग विभिन्न युर्गा और समाजों में अलग-अलग रूप ग्रहण करता रहा है, किन्तु उसके केन्द्रीय लक्ष्य- आत्मानुशासन, वित्तशुद्धि और समग्र कल्याण अखण्डित बने रहे हैं। यह समझना आवश्यक है कि किसी भी सभ्यतागत ज्ञान-प्रणाली की प्रासंगिकता उसकी अनुकूलनशीलता पर निर्भर करती है, न कि उसके स्थिरीकरण के | योग का इतिहास स्वयं सांस्कृतिक अनुकूलन का इतिहास है। वैदिक काल में तप और ध्यान मुख्यतः यज्ञ और कत की अवधारणा से जुड़े थे। उपनिषदिक युग में वही ध्यान आत्मा-ब्रह्म की पहचान का साधन बना। श्रमण परम्पराओं में योग ने सन्यास, ध्यान और अहिंसा के रूप ग्रहण किए। पतंजलि के योगसूत्रों में योग को दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक अनुशासन के रूप में सूत्रबद्ध किया गया।

मध्यकालीन भारत में हठयोग और तान्त्रिक परम्पराओं ने शरीर को साधना का केन्द्र बनाया। यह परिवर्तन तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक स्थितियों के अनुरूप था, जहाँ देह को त्याज्य नहीं, बल्कि साधन माना गया। यह अनुकूलन योग को अधिक व्यापक समाज से जोड़ने का माध्यम बना। अतः यह स्पष्ट है कि योग कभी एकरूप नहीं रहा, बल्कि उसने हर युग में नई सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को ढाला। औपनिवेशिक काल में योग को एक ओर तो पाश्चात्य विद्वानों द्वारा रहस्यमय और अवैज्ञानिक बताकर हाशिए पर रखा गया, वहीं दूसरी ओर भारतीय चिन्तकों ने योग को आधुनिक सन्दर्भों में पुनर्परिभाषित करने का प्रयास किया। स्वामी विवेकानन्द ने योग को सार्वभौमिक मानव-चेतना और तर्कशीलता से जोड़ते हुए पश्चिम में प्रस्तुत किया। उन्होंने  राजयोग को वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में व्याख्यायित किया, जिससे योग आधुनिक बौद्धिक विमर्श में प्रवेश कर सका।

महात्मा गांधी ने योग को नैतिक आत्मसंयम, सत्य और अहिंसा के साथ जोड़ा। उनके लिए योग केवल व्यक्तिगत मुक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक नैतिकता का आधार था। श्री अरविन्द ने योग को चेतना की उत्क्रांति की प्रक्रिया के रूप में देखा, जो व्यक्तिगत साधना से आगे बढ़कर सामूहिक मानव-विकास का साधन बन सकता है। स्वतन्त्र भारत में योग का अनुकूलन शिक्षा, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ा। विद्यालयों में योग-शिक्षा, आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के साथ योग का समन्वय, तथा राज्य स्तरीय संस्थानों की स्थापनाये सभी योग के आधुनिक भारतीय अनुव अनुकूलन के उदाहरण हैं। भारतीय ध्यान और चेतना-परम्परा किसी एक दर्शन या संप्रदाय की बौद्धिक संपत्ति नहीं रही है। यह एक दीर्घकालीन, बहुस्तरीय और संवादात्मक परम्परा है, जिसमें शैव, बौद्ध, योग, जैन और सिख चिन्तन परस्पर भिन्न होते हुए भी एक साझा अनुभवात्मक आधार पर स्थित दिखाई देते हैं। इन परम्पराओं का केन्द्रीय प्रश्न मन, चेतना, आचरण और मुक्ति है और इनका समाधान केवल दार्शनिक तर्क से नहीं, बल्कि साधना, अनुशासन और जीवन-परिवर्तन से जुड़ा हुआ है।

 

बौद्ध दर्शन में माइंडफुल्लनेस :- 

भगवान बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग में सम्मा-सति (सम्यक स्मृति / माइंडफुलनेस) को केन्द्रीय स्थान दिया। बोद्ध साधना में ध्यान (झान) और विपश्यना (विपस्सना) का उद्देश्य मन को किसी ईश्वर में विलीन करना नहीं, बल्कि यथार्थ को यथावत् देखना है। पाली साहित्य दीघ निकाय, मन्जिम निकाय और विशेष रूप से सतिपद्वान सुत्त में माइंडफुलनेस को चार क्षेत्रों में अभ्यास करने की विधि दी गई है: काय, वेदना, चित्त और धम्मा यहाँ माइंडफुलनेस केवल मानसिक सतर्कता नहीं, बल्कि नैतिक सजगता है, जो लोभ, द्वेष और मोह के क्षय की ओर ले जाती है। बौद्ध परम्परा में इसे “सति” कहा गया है अर्थात् वर्तमान क्षण में पूर्ण जागरूकता के साथ स्वयं और संसार का अवलोकन। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में बर्मा, थाईलैंड और श्रीलंका में विपश्यना केंद्रों के माध्यम से यह परम्परा वैश्विक बनी। आगे चलकर जॉन काबट जिन द्वारा विकसित Mindfulness-Based Stress Reduction (MBSR) ने माइंडफुलनेस को चिकित्सा, मानसिक स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में स्थापित किया, यद्यपि इस प्रक्रिया में इसके नैतिक और दार्शनिक आयाम आंशिक रूप से सीमित भी हो गए।

पतंजलि योगसूत्र भारतीय ध्यान परम्परा को एक सुव्यवस्थित दार्शनिक ढाँचा प्रदान करता है। योग का उद्देश्य स्पष्ट रूप से परिभाषित है योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। पतंजलि के अनुसार यह निरोध अभ्यास (निरन्तर सजग प्रयास) और वैराग्य (आसक्ति-क्षय) के द्वारा संभव है। चित्त की पाँच भूमियाँ क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध-बताई गई हैं, जिनमें केवल एकाग्र अवस्था में स्थायी समाधि संभव है।

योगसूत्र में समाधि केवल ध्यान की अवस्था नहीं, बल्कि सत्य-बोध, क्लेश-क्षय, कर्मबन्धन-शैथिल्य और मुक्ति की प्रक्रिया है। यहाँ ध्यान का उद्देश्य आत्म-नियन्त्रण के साथ नैतिक अनुशासन भी है, जो योग को केवल तकनीक नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति बनाता है । जैन परम्परा में विकसित प्रेक्षा-ध्यान का मूल सिद्धान्त है- गहराई से देखना, बिना आग्रह और बिना विरोध के। आधुनिक काल में आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ ने इसे वैज्ञानिक और व्यवहारिक रूप दिया।

प्रेक्षा-ध्यान शरीर, श्रास, भाव और विचारों के प्रति साक्षी-भाव को विकसित करता है। इसका दार्शनिक आधार यह बोध है कि व्यक्ति अपने विचार और भाव नहीं है, बल्कि उनका द्रष्टा है। यही द्रष्टा भाव अहिंसा, संयम और आत्मानुशासन की ओर ले जाता है। व्यवहारिक स्तर पर यह ध्यान क्रोध, भय, तनाब और असन्तुलन को घटाकर सामाजिक नैतिकता को सुदृढ़ करता है। भारतीय ध्यान परम्परा का एक महत्वपूर्ण, किन्तु अकसर उपेक्षित पक्ष मिख चिन्तन है। सिख परम्परा ध्यान को संन्यास या संसार-त्याग से नहीं जोड़ती, बल्कि गृहस्थ जीवन में सजगता के साथ स्थापित करती है। गुरु नानक देव जी ने स्पष्ट किया कि मुक्ति जंगलों में नहीं, बल्कि समाज के भीतर नैतिक और सजग जीवन जीने में है।

सिख साधना का केन्द्र है नाम-सिमरन ईश्वर के नाम का सतत स्मरण महज अवस्था स्वाभाविक, अहंकार-रहित चेतना , हुक्म की स्वीकृति जीवन की यथार्थ स्थितियों को समझकर कर्म करना गुरु ग्रंथ साहिब में बार-बार मन की चंचलता, अहंकार (होमे) और विक्षेप को बन्धन का कारण बताया गया है। नाम-सिमरन का उद्देश्य मन को स्थिर करना नहीं, बल्कि उसे अहंकार से मुक्त कर नैतिक और करुणामय कर्म की ओर प्रवृत्त करना है। इस अर्थ में सिख परम्परा की सजगता बौद्ध सति और योग के चित्त-निरोध से भिन्न होते हुए भी उनसे गहरे स्तर पर जुड़ी हुई है। सिख ध्यान व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सेवा, समानता और सामाजिक न्याय से अनिवार्य रूप से जुड़ा होता है। यही इसे विशुद्ध “आध्यात्मिक तकनीक” से आगे बढ़ाकर सामाजिक चेतना की साधना बनाता है।

बौद्ध सति, पतंजलि योग, जैन प्रेक्षा-ध्यान और सिख नाम सिमरन सभी के मूल में एक साझा तत्त्व है: साक्षी-भाव और सजग चेतना। अन्तर केवल अभिव्यक्ति और उद्देश्य-प्राथमिकता का है। आधुनिक वैश्विक माइंडफुलनेस आन्दोलन जहाँ मुख्यतः मानसिक स्वास्थ्य और तनाव प्रबन्धन पर केंद्रित है, वहीं भारतीय परम्पराएँ चेतना के साथ नैतिकता, आत्मानुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व को भी जोड़ती हैं। इस दृष्टि से भारतीय ध्यान परम्परा केवल मनोवैज्ञानिक अभ्यास नहीं, बल्कि समग्र मानव-परिवर्तन की सभ्यतागत परियोजना है जिसमें आत्म, समाज और धर्म (नैतिक नियम) एक-दूसरे से पृथक नहीं हैं। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में योग का वैश्विक प्रसार तेज़ हुआ। पश्चिमी समाजों में योग को तनाव-निवारण, मानसिक स्वास्थ्य, जीवन-शैली सुधार और वैकल्पिक चिकित्सा के रूप में अपनाया गया। मनोविज्ञान, न्यूरोसाइंस और चिकित्सा विज्ञान के साथ योग का संवाद इस वैश्विक अनुकूलन का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। यहाँ यह स्वीकार करना आवश्यक है कि वैश्विक सन्दर्भ में योग का यह प्रयोग पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। मानसिक तनाव, अवसाद और उपभोक्तावादी जीवन-शैली से उत्पन्न संकटों के बीच योग ने सन्तुलन और आत्म-नियन्त्रण का मार्ग प्रस्तुत किया। यह योग की सार्वभौमिक मानवीय अपील को दर्शाता है। किन्तु यह अनुकूलन तभी सार्थक कहा जा सकता है, जब योग को केवल तकनीक या व्यायाम तक सीमित न किया जाए, बल्कि उसके नैतिक और दार्शनिक आयामों को भी मान्यता दी जाए। जहाँ ऐसा नहीं होता, वहीं अनुकूलन धीरे-धीरे विनियोग में परिवर्तित होने लगता है ।

सांस्कृतिक अनुकूलन और सांस्कृतिक विनियोग के बीच मूल अन्तर सन्दर्भ, सम्मान और अधिकार का है। अनुकूलन में संवाद, पारस्परिक सीख और स्रोत-संस्कृति की मान्यता निहित होती है, जबकि विनियोग में चयनात्मक उपयोग, सरलीकरण और ऐतिहासिक निस्मरण प्रमुख होते हैं। योग का अनुकूलन तब विनियोग बन जाता है. जब उसे उसकी दार्शनिक परम्परा से अलग कर केवल शारीरिक फिटनेस या बाज़ार उत्पाद में बदल दिया जाता है। यह प्रक्रिया योग को एक जीवंत ज्ञान-प्रणाली से घटाकर एक सांस्कृतिक वस्तु बना देती है।यह स्पष्ट किया गया है कि योग की सांस्कृतिक अनुकूलनशीलता उसकी ऐतिहासिक शक्ति रही है। आधुनिक भारत और वेधिक समाज में योग का प्रसार आंशिक रूप से इसी अनुकूलन का परिणाम है। किन्तु जब यह प्रक्रिया सन्दर्भ-विच्छेदन, बालारीकरण और औपनिवेशिक ज्ञान-संरचनाओं से जुड़ जाती है. तब सांस्कृतिक विनियोग की समस्या उत्पन्न होती है। अगले भाग में इसी विनियोग की अवधारणा, उसके औपनिवेशिक और पूँजीवादी आयामों का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।

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डॉ. अनूप पति तिवारी

ई-मेल:- anooppatitiwari@gmail.com

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