भारतीय ज्ञान परंपरा में वैज्ञानिक दृष्टि: तर्क, अनुभव और प्रयोग की अनवरत परंपरा

भारतीय ज्ञान परंपरा को प्रायः आध्यात्मिकता, धर्म और दर्शन की दृष्टि से देखा जाता रहा है, किंतु यदि इसके मूल स्रोतों, विचार पद्धतियों और ज्ञान संरचनाओं का गंभीर अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट रूप से समझ में आता है कि यह परंपरा केवल आध्यात्मिक अनुभूति पर आधारित नहीं थी, बल्कि जिज्ञासा, तर्कबुद्धि, अनुभवजन्य ज्ञान और प्रयोगशीलता की एक समृद्ध एवं सुसंगठित धारा थी।

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छत्तीसगढ़ के आरंभिक शैव मठ एवं शैवाचार्य एक आभिलेखिक अध्ययन

आधुनिक छत्तीसगढ़ जिसे प्राचीन काल में दक्षिण कोसल कहा जाता था, लगभग चौथी –पाँचवी शती ईस्वी से ही शैव धर्म के एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में प्रचलित रहा। यहाँ से प्राप्त सैकड़ों शैव मूर्तियों, चार दर्जन से भी अधिक शैव मंदिरों तथा मौद्रिक एवं आभिलेखिक साक्ष्यों की पर्याप्त उपस्थिति से भी प्राचीन छत्तीसगढ़ में शैव धर्म के व्यापक प्रचलन की पुष्टि होती है। इनमें से आभिलेखिक स्रोत यहाँ की शैव परम्परा की सर्वाधिक प्रामाणिक सूचनाएं उपलब्ध कराते हैं। अभिलेखों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ज्ञात होता है कि…

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भाषा और संचार शिक्षा का अंतर्संबंध

सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य स्वभावतः अपन भाव, अपने विचार दूसरे मनुष्य तक पहुँचाता और दूसरे के भावों को स्वयं समझना चाहता है। इसके लिए वह जिन माध्यमों को अपनाता है, भाषा उनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। मानव के क्रियाकलापों और व्यवहार का साधन, उसकी प्रत्येक वाचिक क्रिया का आधार और विचारों का माध्यम होने के कारण अपने व्यापक अर्थ में भाषा वह साधन है जिसके द्वारा एक प्राणी दूसरे प्राणी तक अपने भाव, विचार या अभिप्राय प्रेषित करता है और दूसरे के भाव विचार या अभिप्राय स्वयं ग्रहण…

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हितोपदेश की नीति-दृष्टि एवं वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था

सार :- भारतीय ज्ञान परंपरा में नीति, कूटनीति एवं राज्य-व्यवस्था संबंधी विचार केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि अत्यंत व्यवहारिक एवं रणनीतिक रहे हैं। हितोपदेश ऐसा ही एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें मित्रता, शक्ति-संतुलन, संधि, संघर्ष, राजनीतिक व्यवहार एवं रणनीतिक बुद्धिमत्ता जैसे तत्व कथाओं एवं नीति-वचनों के माध्यम से प्रस्तुत किए गए हैं। प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य हितोपदेश की नीति-दृष्टि का वर्तमान बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के संदर्भ में विश्लेषण करना है। आज की वैश्विक राजनीति, जो शक्ति-संतुलन, सामरिक प्रतिस्पर्धा, क्षेत्रीय गठबंधनों एवं बहुस्तरीय कूटनीति से प्रभावित है, उसमें प्राचीन भारतीय नीति चिंतन…

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योग का सांस्कृतिक अनुकूलन और सांस्कृतिक विनियोगः एक डीकॉलोनियल अध्ययन

सारांश :-  योग भारतीय सभ्यता की एक प्राचीन, सुदृढ़ और निरन्तर विकसित होती हुई ज्ञान-परम्परा है। समकालीन वैश्विक सन्दर्भ में योग के तीव्र प्रसार ने दो समानान्तर प्रक्रियाओं को जन्म दिया है सांस्कृतिक अनुकूलन और सांस्कृतिक विनियोगा जहाँ सांस्कृतिक अनुकूलन योग को विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भों में प्रासंगिक बनाए रखता है, वहीं सांस्कृतिक विनियोग योग को उसके दार्शनिक, ऐतिहासिक और नैतिक आधारों से पृथक कर एक उपभोग्य उत्पाद में परिवर्तित कर देता है। यह शोध-पत्र डीकॉलोनियल दृष्टिकोण के माध्यम से यह तर्क प्रस्तुत करता है कि आधुनिक योग-विमर्श ओपनिवेशिक ज्ञान-संरचनाओं और…

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हिन्दू वैदिक सिद्धांतों में सतत विकास लक्ष्यों की झलक

शोध सार :-  वर्तमान में वैश्विक समुदाय मानवजनित पर्यावरणीय ह्रास के एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है, जिसे वैज्ञानिक एन्थ्रोपोसीन युग की संज्ञा देते हैं । उपभोग केंद्रित जीवनशैली और अनियंत्रित आर्थिक विकास ने पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से संकटग्रस्त कर दिया है । इस वैश्विक संकट के समाधान हेतु, संयुक्त राष्ट्र ने 17 सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) का निर्धारण किया है, जिनका लक्ष्य 2030 तक गरीबी उन्मूलन, जलवायु परिवर्तन का सामना करने और असमानता को समाप्त करते हुए शांति व समृद्धि सुनिश्चित करना है…

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