Category: सम्पादकीय (Editorial)
प्रिय पाठकों
भारतीय ज्ञान-परंपरा का स्वरूप मूलतः किसी एक कर्ता, कालखंड अथवा सत्ता-संरचना से आबद्ध नहीं रहा है। यह परंपरा अपौरुषेयता के उस बोध से विकसित हुई है, जिसमें ज्ञान को मानव-निर्मित उत्पाद न मानकर एक सतत अन्वेषणशील चेतना के रूप में देखा गया है। इसी कारण भारतीय बौद्धिक परंपरा न तो इतिहास में बंद हु़ई है और न ही भूगोल में सीमित रही है, वह समय, समाज और संदर्भों के पार एक जीवंत वैचारिक प्रवाह के रूप में निरंतर विकसित होती रही है।
पत्रिका अनंत अनादि का यह प्रथम अंक इसी सतत ज्ञान-प्रवाह के समकालीन पुनर्पाठ का एक अकादमिक प्रयास है। पत्रिका का सूत्र है अनादि ज्ञान एवम् अनंत दृष्टि यह केवल एक सूत्रवाक्य नहीं है बल्कि भारतीय दर्शन की उस मूल प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है जिसमें ज्ञान को अंतिम निष्कर्ष नहीं बल्कि निरंतर विस्तारमान दृष्टि के रूप में स्वीकार किया गया है। ऋग्वैदिक उद्घोष है “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” यह भारतीय चिंतन की उसी उद्घाटनशील मानसिकता को रेखांकित करता है, जहाँ विचार किसी एक दिशा, परंपरा या मत तक सीमित नहीं होते। भारतीय परंपरा में ज्ञान को स्थिति (state) नहीं बल्कि साधना (process) माना गया है। उपनिषदों में विद्या को आत्मबोध से जोड़ा गया है, जहाँ ज्ञान का उद्देश्य केवल सूचना-संग्रह नहीं,बल्कि अस्तित्वगत बोध और मूल्यात्मक परिपक्वता है। विद्यया अमृतमश्नुते का संकेत इसी ओर है कि ज्ञान जीवन को अर्थ देता है न कि केवल उपयोगिता। इस दृष्टि से भारतीय ज्ञान-परंपरा का विकास नैतिक, आध्यात्मिक और सामाजिक तीनों स्तरों पर समग्रता के साथ हुआ है। यहाँ दर्शन केवल अमूर्त चिंतन नहीं रहा, बल्कि जीवन-पद्धति और सामाजिक उत्तरदायित्व से गहराई से जुड़ा रहा। भारतीय दर्शन की संवादात्मक संरचना सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदान्त इस बात का प्रमाण है कि मतभेद को विघटन नहीं, बल्कि बौद्धिक परिष्कार का माध्यम माना गया। शास्त्रार्थ की परंपरा ने ज्ञान को जड़ निष्कर्ष बनने से रोका और उसे सतत प्रश्नशील बनाए रखा।
बृहदारण्यक उपनिषद् निर्देश देता है श्रवण, मनन और निदिध्यासन का जो भारतीय ज्ञान-पद्धति की गहनता को स्पष्ट करता है। यहाँ ज्ञान अर्जन एक तात्कालिक क्रिया नहीं, बल्कि दीर्घ बौद्धिक और आंतरिक अनुशासन की प्रक्रिया है। प्रिय पाठकों अनंत अनादि यह त्रैमासिक पत्रिका इसी परंपरा को समकालीन अकादमिक विमर्श में पुनर्स्थापित करने का प्रयास करती है, जहाँ विचार केवल प्रस्तुत नहीं किए जाते बल्कि विवेकपूर्ण संवाद के लिए आमंत्रित किए जाते हैं।
आपको विदित है की भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वह ज्ञान को स्थिर निष्कर्ष मानने के बजाय नेति–नेति एवम् अनुभव, संवाद और विवेक के माध्यम से निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया के रूप में देखती है। इसी कारण भारतीय दृष्टि व्यक्ति से समाज तक, लौकिक से पारलौकिक तक और वर्तमान से भविष्य तक विस्तृत रहती है। समकालीन वैश्विक अकादमिक परिदृश्य में जहाँ ज्ञान को प्रायः बाज़ार, तात्कालिक उपयोगिता और तकनीकी दक्षता के मानदंडों पर परखा जा रहा है, वहाँ भारतीय ज्ञान-परंपरा एक वैकल्पिक ज्ञानमीमांसीय ढांचा प्रस्तुत करती है। यहाँ ज्ञान का प्रयोजन केवल दक्षता नहीं बल्कि लोकमंगल है ऐसा कल्याण जो व्यक्ति और समाज दोनों को संतुलित रूप से विकसित करता है। सर्वे भवन्तु सुखिनः का भाव इसी सामाजिक उत्तरदायित्व की चेतना को अभिव्यक्त करता है।
इस प्रथम अंक में मैं यह प्रमुख रूप से बताना चाहता हूँ की पत्रिका अनंत अनादि का उद्देश्य संस्कृति, विचार और समकालीन प्रश्नों को भारतीय ज्ञान-परंपरा के आलोक में अकादमिक अनुशासन और शोधात्मक गंभीरता के साथ प्रस्तुत करना है। हमारी यह पत्रिका संस्कृति को न तो जड़ अतीत मानती है और न ही विचार को वैचारिक ध्रुवीकरण का उपकरण, बल्कि उसे सतत पुनर्विचार और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखती है। प्रथम अंक के माध्यम से अनंत अनादि यह स्पष्ट बौद्धिक संकल्प व्यक्त करता है कि हिन्दू अध्ययन केवल इतिहास का अध्ययन नहीं बल्कि वर्तमान की व्याख्या और भविष्य की दिशा निर्धारित करने का सशक्त माध्यम है। यह मंच शोधकर्ताओं, अध्येताओं और विचारकों को आमंत्रित करता है कि वे भारतीय दृष्टि से समकालीन समस्याओं पर तर्कसंगत, संदर्भयुक्त और गंभीर विमर्श प्रस्तुत करें। अंततः मैं यही बताना चाहता हूँ की अनंत अनादि उस सनातन वैचारिक यात्रा का एक अकादमिक पड़ाव है, जहाँ अनादि ज्ञान का पुनर्पाठ अनंत दृष्टि के साथ किया जाता है। यह प्रयास केवल बौद्धिक स्पष्टता ही नहीं बल्कि एक मूल्याधारित, संतुलित और समग्र समाज की वैचारिक आधारभूमि निर्मित करने की दिशा में एक विनम्र किंतु सजग कदम है।
आपसे मैं विशेष रूप से यह भी निवेदन करना चाहता हूँ कि अनंत अनादि का प्रकाशन देवरिया से किया जा रहा है। पूर्वांचल की सांस्कृतिक धरती, लोकसंस्कारों की गहराई और वैचारिक जीवंतता इस पत्रिका की आत्मा में विद्यमान है। प्रिय पाठकों हमारा उद्देश्य केवल राष्ट्रीय स्तर पर विमर्श प्रस्तुत करना नहीं बल्कि जनपदों की बौद्धिक ऊर्जा विशेषकर युवा पीढ़ी (जेन-जी) को शोध और लेखन की दिशा में प्रेरित करना भी है। जनपद देवरिया जो लोकजीवन, परंपरा और बदलते सामाजिक यथार्थ का संगम है यहां से प्रकाशित यह पत्रिका यह संदेश देती है कि ज्ञान की राजधानी केवल महानगर नहीं होते बल्कि जनपद भी वैचारिक संपदा के केंद्र बन सकते हैं। मैं चाहता हूँ कि इस क्षेत्र के विद्यार्थी, शोधार्थी और युवा चिंतक अपनी बौद्धिक क्षमता को अभिव्यक्त करें, स्थानीय अनुभवों को वैश्विक विमर्श से जोड़ें, और स्थानीयता की मिट्टी से जुड़ी संवेदना को अकादमिक गंभीरता के साथ प्रस्तुत करें। अब अन्त में आपसे यही कहना चाहता हूँ की न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ज्ञान की यही शुद्धता, यही दृष्टि इस पत्रिका का आधार और उद्देश्य है।
संपादक
सुमित राय
अनन्त अनादि (जनवरी – मार्च 2026 अंक)
प्रिय पाठकों
भारतीय ज्ञान-परंपरा का स्वरूप मूलतः किसी एक कर्ता, कालखंड अथवा सत्ता-संरचना से आबद्ध नहीं रहा है। यह परंपरा अपौरुषेयता के उस बोध से विकसित हुई है, जिसमें ज्ञान को मानव-निर्मित उत्पाद न मानकर एक सतत अन्वेषणशील चेतना के रूप में देखा गया है। इसी कारण भारतीय बौद्धिक परंपरा न तो इतिहास में बंद हु़ई है और न ही भूगोल में सीमित रही है, वह समय, समाज और संदर्भों के पार एक जीवंत वैचारिक प्रवाह के रूप में निरंतर विकसित होती रही है।अनन्त अनादि इसी सतत ज्ञान-प्रवाह के समकालीन पुनर्पाठ का…
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