विद्यावारिधि (Ph.D) प्रवेश सूचना-2026-27

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (केन्द्रीय विश्वविद्यालय) नई दिल्ली, विद्यावारिधि (Ph.D) प्रवेश सूचना-2026-27

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Nalanda University, Bihar

Last Date- 15.09.2026 Apply Link – https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSfi-oC3howeDPy0vrSQyBhyJ7ZV9_8sjHeDDWpEj3TpXxXhwA/viewform नालंदा विश्वविद्यालय में हिंदू स्टडीज़ में शिक्षण पदों के लिए सुनहरा अवसर , हिंदू स्टडीज़ विषय में निम्नलिखित शिक्षण पदों के लिए भर्ती का विज्ञापन जारी किया गया है:

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सनातन धर्म : मानवता, संस्कृति और आध्यात्मिकता का शाश्वत प्रकाश

धर्मो रक्षति रक्षितः – यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन का मूल सिद्धांत है। सनातन धर्म संसार की उन प्राचीनतम आध्यात्मिक परम्पराओं में से है, जिसने मानव जीवन को केवल पूजा-पद्धति तक सीमित न रखकर उसे सत्य, करुणा, आत्मानुशासन और लोकमंगल के साथ जोड़ा। सनातन का अर्थ है – जो अनादि हो, जिसका न आदि हो न अंत। अतः सनातन धर्म किसी एक समय, व्यक्ति या पुस्तक से उत्पन्न धर्म नहीं, बल्कि शाश्वत जीवन-पद्धति है। भारतीय संस्कृति की आत्मा यदि किसी में निवास करती है, तो वह सनातन…

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अतिथि अध्यापकों की अस्थायी नियुक्ति

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा आवेदन की अंतिम तिथि – 14/08/2026 आवेदन लिंक – https://mgahvrec.samarth.edu.in/

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लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास: एक कालजयी व्यक्तित्व

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के आकाश के वह जाज्वल्यमान सूर्य हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से न केवल राम-कथा को जन-जन तक पहुँचाया, बल्कि मध्यकालीन भारत में भक्ति और मर्यादा का एक नया आदर्श स्थापित किया। उनके द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ आज भी भारतीय संस्कृति का आधार स्तंभ माना जाता है। जन्म और प्रारंभिक जीवन : तुलसीदास जी के जन्म के समय और स्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद है, परंतु अधिकांश विद्वान उनका जन्म संवत् 1589 (1532 ईस्वी) के आसपास मानते हैं। उनके जन्मस्थान के रूप में उत्तर प्रदेश के चित्रकूट…

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Mimaṃsa Principles in Modern Indian Statutory Law

Writer – Ujjawal MA Hindu studies ( university of delhi) INTRODUCTION Mīmāṃsā one of six orthodox darśanas (schools of Indian philosophy) whose original purpose was to reconcile contradictory Vedic injunction (vidhi), to arbitrate between ritual and duty as described in Jaimini’s Mīmāṃsā Sūtra (600-400 BCE) and later in the interpretations of Śabara (5th century CE), Kumārila Bhaṭṭa and Prabhākara, systematises rules such as reconciling contradictory texts, preferring the intention, and preferring a given term. These rules are not directly applicable to contemporary Indian statutory law; but nevertheless form a “constitutional-style”…

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