शोध सार यह शोध पत्र रामायण की मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना की आलोचनात्मक समीक्षा करता है। मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग- संघर्ष और अर्थ आधारित अधिरचना की अवधारणाओं पर आधारित है जो ग्रंथों को प्रायः वैचारिक और सत्ता संबंधी उत्पाद के रूप में देखता है। इसी दृष्टि से रामायण को सामंती प्रभुत्व, जातिगत संरचना और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के रूप में स्वीकार करता है। यह लेख समीक्षा करता है कि, मार्क्सवादी पद्धति भारतीय काव्य शास्त्रीय उपकरणों (यथा शब्द- शक्ति, रस, ध्वनि, प्रसंग आदि) की उपेक्षा करते हुए केवल शब्दों के भावार्थों…
Read MoreCategory: तत्त्वबोधिनी (Tattvabodhinī)
भारतीय ज्ञान परंपरा में वैज्ञानिक दृष्टि: तर्क, अनुभव और प्रयोग की अनवरत परंपरा
भारतीय ज्ञान परंपरा को प्रायः आध्यात्मिकता, धर्म और दर्शन की दृष्टि से देखा जाता रहा है, किंतु यदि इसके मूल स्रोतों, विचार पद्धतियों और ज्ञान संरचनाओं का गंभीर अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट रूप से समझ में आता है कि यह परंपरा केवल आध्यात्मिक अनुभूति पर आधारित नहीं थी, बल्कि जिज्ञासा, तर्कबुद्धि, अनुभवजन्य ज्ञान और प्रयोगशीलता की एक समृद्ध एवं सुसंगठित धारा थी।
Read Moreयोग का सांस्कृतिक अनुकूलन और सांस्कृतिक विनियोगः एक डीकॉलोनियल अध्ययन
सारांश :- योग भारतीय सभ्यता की एक प्राचीन, सुदृढ़ और निरन्तर विकसित होती हुई ज्ञान-परम्परा है। समकालीन वैश्विक सन्दर्भ में योग के तीव्र प्रसार ने दो समानान्तर प्रक्रियाओं को जन्म दिया है सांस्कृतिक अनुकूलन और सांस्कृतिक विनियोगा जहाँ सांस्कृतिक अनुकूलन योग को विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भों में प्रासंगिक बनाए रखता है, वहीं सांस्कृतिक विनियोग योग को उसके दार्शनिक, ऐतिहासिक और नैतिक आधारों से पृथक कर एक उपभोग्य उत्पाद में परिवर्तित कर देता है। यह शोध-पत्र डीकॉलोनियल दृष्टिकोण के माध्यम से यह तर्क प्रस्तुत करता है कि आधुनिक योग-विमर्श ओपनिवेशिक ज्ञान-संरचनाओं और…
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