आधुनिक छत्तीसगढ़ जिसे प्राचीन काल में दक्षिण कोसल कहा जाता था, लगभग चौथी –पाँचवी शती ईस्वी से ही शैव धर्म के एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में प्रचलित रहा। यहाँ से प्राप्त सैकड़ों शैव मूर्तियों, चार दर्जन से भी अधिक शैव मंदिरों तथा मौद्रिक एवं आभिलेखिक साक्ष्यों की पर्याप्त उपस्थिति से भी प्राचीन छत्तीसगढ़ में शैव धर्म के व्यापक प्रचलन की पुष्टि होती है। इनमें से आभिलेखिक स्रोत यहाँ की शैव परम्परा की सर्वाधिक प्रामाणिक सूचनाएं उपलब्ध कराते हैं। अभिलेखों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ज्ञात होता है कि छत्तीसगढ़ में शैव धर्म का प्रचलन तो प्रत्यक्ष रूप से चौथी शती ईस्वी में हो गया था किन्तु दक्षिण कोसल के पाण्डुवंशी राजा महाशिवगुप्त बालार्जुन के समय शैव धर्म को भरपूर राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। इसके द्वारा जारी किये गए दर्जनों अभिलेखों में अपने को परममाहेश्वर कहने के साथ-साथ अनेक शैव मंदिर एवं मठों के निर्माण तथा उनकी देखभाल के लिए पाशुपत, शैव सिद्धांती एवं सोम सिद्धांती शैवाचार्यों शैवाचार्यों को ग्राम दान आदि देने संबंधी सूचनाएं प्राप्त होती हैं। ये शैव मठ वास्तव में न केवल छत्तीसगढ़ के अपितु मध्य भारत के आरंभिक शैव मठों में से एक हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में उपरोक्त पृष्ठभूमि के आलोक में छत्तीसगढ़ के आरंभिक शैव मठों, उनसे संबंधित मंदिरों एवं शैवाचार्यों संबंधी विभिन्न अवधारणाओं का अध्ययन किया गया है।
शैव धर्म के मुख्य रूप से चार उप सम्प्रदाय यथा- पशुपत , शैव, कापालिक एवं कालामुख अति महत्त्वपूर्ण थे। छत्तीसगढ़ में इनमें से चारों का प्रचार-प्रसार था किन्तु शैव सिद्धांती सर्वाधिक लोकप्रिय थे। शैव सिद्धांतियों ने लगभग सातवीं शती ईस्वी में शैव मठों की परम्परा आरम्भ की, जो मुख्यतः शैव साधकों को दीक्षित करने और उनके तप आदि का प्रमुख स्थान था। आभिलेखिक स्रोतों से तीन प्रमुख शैव सिद्धांती मठों की सूचना प्राप्त होती है जिन्हें आमर्दक मठ, मतमयूर मठ तथा गोलकी मठ के नाम से पुकारा गया है। इनमें सर्वाधिक प्राचीन व मूल मठ आमर्दक परम्परा का था। छत्तीसगढ़ में स्थापित मठों का संबंध आमर्दक एवं मतमयूर से था, इस बात की सूचना छत्तीसगढ़ के शासकों द्वारा निर्गत अभिलेखों से प्राप्त होती है।[1] किन्तु इस शोध पत्र का संबंध आरंभिक शैव मठों से होने के कारण हमारे लिए आमर्दक मठ ही प्रासंगिक है।
सिरपुर स्थित बालेश्वर भट्टारक मंदिर परिसर के शैव मठ एवं उनसे संबंधित शैवाचार्य :-
दक्षिण कोसल का पांडुवंशी राजा महाशिवगुप्त बालार्जुन (690 -750 ईस्वी) शिव का परम अनुयायी था। उसने शैव धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। इसके द्वारा दर्जनों अभिलेख जारी किये गए जो शैव मंदिरों-मठों आदि की स्थापना के साथ-साथ पाशुपत एवं शैव सिद्धांती आचार्यों को ग्राम दान दिए जाने से संबंधित थीं। श्रीपुर (आधुनिक सिरपुर) महाशिवगुप्त की राजधानी थी और इसने यहाँ एक बालेश्वर भट्टारक शिव मंदिर की स्थापना की जो राजकीय प्रकृति का प्रतीत होता है। इस मंदिर परिसर में समय-समय पर शैव मठों का भी निर्माण होता रहा। सिरपुर से महशिवगुप्त गुप्त बालार्जुन के समय की नौ ताम्र पत्र लेखों की एक निधि प्राप्त हुई है, जो इस मंदिर व मंदिर परिसर के अंतर्गत निर्मित शैव मठों के इतिहास को उद्घाटित करता है। इन अभिलेखों में शैव मठों को मठिका कहा गया है।
इनमे से प्रथम लेख महाशिवगुप्त के राज्य वर्ष सैतीस का तथा अंतिम लेख राज्य वर्ष पचपन का है। प्रथम लेख[2] में वर्णित है कि बालेश्वर मंदिर की स्थापना के उपलक्ष में महाशिवगुप्त ने स्वल्पशरकार मार्ग क्षेत्र में स्थित हस्तिपद्रक नामक ग्राम का दान शैवाचार्य व भगवतपद दीर्घशिव के शिष्य व्यपशिव को दिया गया था।[3] उल्लेखनीय है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के मथुरा लेख में भी वर्णित उपमित व कपिल विमल आचार्य को भगवत कहा गया।[4] अड़तीसवें राज्य वर्ष में जारी किए गए लेख में पुनः शैवाचार्य व्यपशिव को बालेश्वर भट्टारक मंदिर परिसर में एक मठिका के निर्माण तथा यहाँ सत्र आयोजित करने, शिक्षा देने तथा मंदिर के पूजा हेतु आरण्यंग भोग में स्थित भांडागारकट्टक ग्राम का दान दिया गया।[5] यहाँ व्यपशिव को अघोरशिव का प्रशिष्य कहा गया। अड़तीसवे राज्य वर्ष के आठ वर्ष बाद ताम्र पत्र लेख निधि का तीसरा लेख महशिवगुप्त के राज्य वर्ष छियालीस मे जारी किया गया। इस लेख के अनुसार महाशिवगुप्त ने बालेश्वर मंदिर परिसर का और अधिक विस्तार करते हुए परिसर स्थित मठिका के भीतर दयेश्वर-भट्टारक मंदिर की स्थापना करवाई। इसके लिए देव भोग में स्थित भांडागारदंगक नामक ग्राम का दान दिया। यह दान मंदिर की मजबूती के लिए घेरे का निर्माण तथा हर (शिव) के लिए संगीत एवं पूजा किए जाने हेतु दिया गया।[6] इसमे किसी शैवाचार्य का तो नाम नहीं प्राप्त होता किन्तु इस निधि के एक अन्य लेख से शैव सिद्धांती व्यपशिव के ही परम्परा में दान दिए जाने की पुष्टि होती है।[7]
महाशिवगुप्त के राज्य वर्ष अड़तालीस के लेख[8] में बालेश्वर भट्टारक मंदिर के साथ राजा की किसी पत्नी का प्रथम बार उल्लेख प्राप्त होता है। यह दान लेख महाशिवगुप्त की रानी अमरदेवी द्वारा बालेश्वर मंदिर परिसर स्थित मठिका में अमरेश्वर भट्टारक मंदिर का निर्माण करवाया गया। मंदिर के गर्भगृह में देव भट्टारक(भगवान) की स्थापना के अवसर पर रानी के आग्रह से महाशिवगुप्त ने शैवाचार्य व्यपशिव की परम्परा में व्यपशिव के उतराधिकारी शिष्य अस्त्र शिव को देवद्रुल्लक ग्राम का दान दिया। यह दान सत्र आयोजित करने, शिष्यों तथा उनके शिष्यों को दीक्षित करने और भेंट समारोहों के आयोजन हेतु खर्च करने के लिए था। यह लेख व्यपशिव गुरु-शिष्य परम्परा के विस्तार व राजा की पत्नी द्वारा मंदिर हेतु दिए गए दान की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। रानी अमरदेवी से संबंधित एक अन्य तिथिविहीन ताम्र निधि लेख[9] में अमरेश्वर मंदिर का उल्लेख है। लेख में वर्णित है कि यह मंदिर मठिका में न होकर तपोवन से लगे मठिका में व्यपशिव द्वारा स्थापित किया गया था। इस अवसर पर रानी अमरदेवी के आग्रह के बाद महाशिवगुप्त ने कल्लाट-सीमा भोग में आने वाले कदम्ब पाद्रुल्लक ग्राम का दान दिया था। इसके पूर्व के अभिलेख में शैवाचार्य व्यपशिव का उल्लेख नहीं करने की भरपाई इस लेख से हो जाती है। अतः ऐसा लगता है कि यह लेख अड़तालीसवे अथवा इसके ठीक बाद के वर्ष में लिखवाया गया था।
महाशिवगुप्त के समय के प्राप्त ताम्र निधि लेखों में से एक लेख राज्य वर्ष बावन का है।[10] इस लेख में जेज्जट नामक व्यक्ति द्वारा श्रीपुर के बालेश्वर भट्ठारक मंदिर स्थित तपोवन में रहने वाले आचार्य अस्त्रशिव जो कि नंदपुर के रहने वाले शैवाचार्य दीर्घशिव के प्रशिष्य व व्यपशिव के शिष्य है, को किक्कीड भुक्ति के अटवितुंग ग्राम का दान दिया गया। लेख में वर्णित जेज्जट कौन था इस विषय में कोई सूचना नहीं प्राप्त होती किन्तु जिस प्रकार से बालेश्वर मंदिर एक राजकीय प्रकृति का मंदिर दिखाई देता है उस आधार पर ऐसा लगता है कि जेज्जट राजपरिवार का ही एक सदस्य रहा हो।[11]
राज्य वर्ष पचपन के एक लेख[12] में महाशिवगुप्त की एक और रानी अम्मादेवी का विवरण आया है। लेख के अनुसार रानी अम्मादेवी ने भी बालेश्वर मंदिर परिसर में अम्मेश्वर -भट्टारक नामक एक मंदिर की स्थापना करवाई। अम्मदेवी के अनुरोध पर स्थाणगुरु (शिक्षक) अस्त्रशिव को ओनी भोग में पड़ने वाले वर्ट्टोंदक नामक ग्राम का दान दिया था। यह दान दो भागों में विभक्त था। इसका आधा भाग मंदिर के जीर्णोंद्धार व पूजा करने के लिए तथा शेष आधा भाग अस्त्रशिव को गुरुदक्षिणा के रूप में प्राप्त था।
संभवतः पचपनवे राज्य वर्ष के ही एक अन्य लेख[13] में पुनः रानी अम्मादेवी का संदर्भ प्राप्त होता है।[14] यह लेख तिथिरहित है किन्तु नताशा बोसमा[15] ने इसे भी राज्य वर्ष पचपन में ही निर्गत हुआ माना है। इस लेख में वर्णित है कि रानी द्वारा अम्मेश्वर-भट्टारक मंदिर को स्वल्पशरकारमार्ग क्षेत्र में स्थित कोशाम्ब्रक ग्राम का दान दिया था। दानग्रहिता के रूप में किसी का भी नाम नहीं मिलता। किन्तु इसी वर्ष के एक अन्य लेख[16] में शैवाचार्य अस्त्रशिव को दान दिए जाने के संदर्भ के कारण यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह दान भी इसी परम्परा के आचार्यों को मिला होगा।[17] लेख में रानी को महाशिवगुप्त को धर्मपत्नी तथा अम्मेश्वर मंदिर को बालेश्वर भट्टारक मंदिर का समीपस्थ कहा गया है। इसे ऐसा प्रकट होता है कि अमरदेवी की तुलना में रानी अम्मादेवी अधिक प्रभावशाली थी।
इस प्रकार राज्य वर्ष सैतीस से पचपनवें वर्ष तक बालेश्वर भट्ठारक मंदिर के तथा इसके परिसर में शैव मठ अथवा मठिका के निर्माण, जीर्णोंधार, धार्मिक, शैक्षिक एवं अन्य क्रियाकलापों के लिए शैव सिद्धांती आचार्यों की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। ये शैवाचार्य पूजा-पाठ व देखभाल के साथ-साथ मंदिर के निर्माण कार्यों में भी सक्रिय रहे। लगभग उन्नीस वर्षों तक एक ही गुरु-शिष्य परम्परा के आचार्यों को भूमि दान दिए जा रहे थे। मंदिर एवं मठ को प्राप्त राजकीय सहयोग तथा सिरपुर राजधानी में महाशिवगुप्त के साथ दो रानियों द्वारा एक ही मंदिर परिसर में अन्य मंदिरों-मठों की स्थापना कराया जाना राजकीय संरक्षण की दृष्टि से रोचक तथ्य प्रस्तुत करता है।[18] बालेश्वर भट्टारक मंदिर पांडुवंशकाल का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मंदिर था। इस मंदिर से जुड़े शैवाचार्य अवश्य ही राजा के राजगुरु पद को भी सुशोभित करते रहे हो। राजा तथा उनके परिवार की पूर्ण आस्था कम से कम महाशिवगुप्त बालार्जुन के राज्य वर्ष पचपन तथा कुल उन्नीस वर्ष तक शैव सिद्धांती आचार्यों के प्रति रही इसमे कोई संदेह नहीं है।[19]
सिरपुर से प्राप्त इन ताम्र पात्र लेखों के अतिरिक्त कुछ अन्य अभिलेखिक प्रमाण भी है जो शैव सिद्धांती आचार्यों तथा उनसे सम्बद्ध अन्य शाखाओं की सूचनाएं प्रदान करती है। महाशिवगुप्त के समय के सेनाकपाट लेख[20] से छत्तीसगढ़ में शैव सिद्धांती आचार्यों की एक अन्य गुरु-शिष्य परम्परा का विस्तार दिखाई देता है। इस लेख में महाशिवगुप्त के पितामह के समय राजन उपाधि धारी एक ब्राह्मण देवरक्षित के पुत्र का उल्लेख है। इसी देवरक्षित का पुत्र दुर्गरक्षित था महाशिवगुप्त का सेवक (अधिकारी अथवा मंत्री) था। दुर्गरक्षित शिव का परमअनुयायी था। इसने शंभू का एक मंदिर बनवाया। इस उपलक्ष में दो हल माप के बराबर काली मिट्टी युक्त भूमि जो गुडासरकारक ग्राम में स्थित थी, का दान इस मंदिर के लिए किया। दानग्रहीता के रूप में आमर्दक से आने वाले सद्याशिवाचार्य का उल्लेख मिलता है। इसी अभिलेख में आगे सद्याशिव के आद्यात्मिक उतराधिकारी सदाशिवचार्य का भी वर्णन है। दुर्गरक्षित ने शिव के एक और मंदिर का निर्माण करवाया तथा इस सदाशिवाचार्य को चार हल माप के काली मिट्टी युक्त भूमि का दान दिया। इसके अतिरिक्त सदाशिवाचार्य को विनायक ग्राम में स्थित दो हल माप वाली तथा श्रीपर्णनिका नामक ग्राम में स्थित लता नामक स्थान पर दो हल माप वाली काली मिट्टी युक्त भूमि का भी दान प्राप्त हुआ। यद्यपि इस लेख में प्रत्यक्ष रूप से केवल मंदिर स्थापना की चर्चा है किन्तु इस लेख मे एक स्थान पर वर्णित है कि आचार्यों को मंदिर के अंदर निवास करना अनिवार्य था तथा ब्याज पर धन लेने की मनाही थी। इसके अतिरिक्त सेनकपाट लेख[21] की कतिपय पंक्तियों में शैव आचार्यों के लिए कुछ निश्चित लक्ष्य निर्धारित किए गए है जिन्हें इनके द्वारा अवश्य ही पूरा करना था। इन्हे याग, बलि, शैव मत में दीक्षित करने संबंधी उत्सव या समारोह का आयोजन करना, निर्वाण-दक्ष या अंतिम परमसुख की व्याख्या करना, शैव सिद्धांत का प्रतिपादन व निःशुल्क भोजन वितरण सत्र) की व्यवस्था किया जाना था। यह प्रत्येक वर्ष अषाढ़, कार्तिक एवं माघ की पूर्णिमा को किया जाता था। इस प्रकार यह अभिलेख शैव सिद्धांत के प्रचार करने व इसके निमित्त विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों के आयोजन के माध्यम से शैव मत में दीक्षित करने आदि का प्रयास किया जाता था जो शैव मठों की उपस्थिति का द्योतक है।[22]
आरंभिक शैव मठ एवं उनका स्वरूप :-
महाशिवगुप्त बालार्जुन के समय के अभिलेखों से जिस प्रकार शैवाचार्यों के संस्थागत प्रचार-प्रसार की सूचना मिलती है वह शैव मठ एवं उनकी कार्यप्रणाली की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। चूंकि छत्तीसगढ़ के ये शैव मठ दक्षिण भारत के चोल व मध्य भारत व अन्य क्षेत्रों में फैले कलचुरिकालीन परिपक्व शैव मठों व उनसे जुड़े शैवाचार्यों की परम्परा की तुलना में कम से कम तीन सौ साल पुराने है, इस दृष्टि से इन्होंने कालांतर के शैवाचार्यों के लिए एक आधार तैयार किया। जैसा कि महाशिवगुप्त के अभिलेखों से विदित है, यहाँ के शैव मठ मूलतः शैव मंदिरों के ही अभिन्न भाग थे। इन मठों का मुख्य कार्य शैव मंदिरों की स्थापना में सहयोग के साथ-साथ मुख्य रूप से शैव साधकों को दीक्षित करना था। शैवाचार्यों का मुख्य कार्य समय-समय पर दीक्षा कार्यक्रम का आयोजन करना था। ये राजा के गुरु पद को भी सुशोभित करते थे जैसा की सेनकपाट लेख में शैवाचार्य अस्त्रशिव को गुरु दक्षिणा देने की बात की गई है किन्तु यह गुरु पद अभी उतना व्यापक अथवा संस्थागत नहीं हुआ था जितना परवर्ती चोल व कलचुरियों के समय हो गया था। इसके अतिरिक्त इन मठों व उनसे जुड़े शैवाचार्यों को राजा अथवा राजन्य वर्ग द्वारा ग्राम दान, भूमि दान आदि दिए जाते थे जिससे प्राप्त आय का उपयोग इन मंदिरों-मठों के जीर्णोद्धार, बलि, याग तथा सत्र आदि आयोजित करने मे उपयोग होते थे। कभी-कभी इन्हें व्यक्तिगत (गुरुदक्षिणा के रूप में) ग्राम दान भी दिए जाते थे। जिसका व्यापक स्वरूप परवर्ती काल में इन शैवाचार्यों के राज्य के गुरु के पद पर सुशोभित होने व राजाओं द्वारा अपने राज्य इन्हीं को समर्पित किये जाने के रूप में दिखायी देता है।
इस प्रकार निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ के आरंभिक शैव मठों ने, शैवाचार्यों , विशेषरूप से शैव सिद्धांती आचार्यों की गुरु-शिष्य परम्परा के माध्यम से शैव धर्म की उस निरन्तरता व संगठित प्रचार-प्रसार की पृष्ठभूमि तैयार की जिसने छत्तीसगढ़ में शैव धर्म को व्यापक स्तर पर स्थापित किया। मठों के माध्यम से शैव धर्म में दीक्षित किये जाने वाले कार्यक्रमों ने निश्चित रूप से इस आदिवासी बहुल क्षेत्र को प्रभावित किया होगा, जो यहाँ की वर्तमान शैव परम्परा मे दिखायी भी देता है। बस्तर जैसे आदिवासी बहुलता वाले क्षेत्र में आज भी दर्जन भर प्राचीन शैव मंदिर न केवल संरक्षित है अपितु बस्तर ग्राम के प्राचीन शैव मंदिर में स्थानीय लोगों द्वारा आज भी पूजा की जाती है। अभिलेखों में शैवाचार्यों का एक कार्य शैव सिद्धांत का प्रचार करना भी बताया गया है, जो शैव धर्म के संस्थागत प्रचार-प्रसार को दर्शाता है। चूंकि छत्तीसगढ़ के ये आरंभिक शैव मठ और मठ परम्परा के आचार्य आमर्दक शाखा से जुड़े थे अतः सातवीं-आठवीं शती ईस्वी में इनका छत्तीसगढ़ में प्रभाव मठों के इतिहास की दृष्टि से भी प्राचीनतम ही हैं। क्योंकि आमर्दक शाखा की भौगोलिक पहचान अब तक हो नहीं पायी है और इनके जो प्राचीनतम आभिलेखिक प्रमाण प्राप्त होते भी हैं उनमें छत्तीसगढ़ उदाहरण प्रमुख हैं।
संदर्भ ग्रंथ :
[1] तिवारी, सुजीत कुमार, छत्तीसगढ़ का शैव पुरातत्त्व (चौथी से तेरहवीं शती ईस्वी तक), 2023 (अप्रकाशित शोध प्रबंध), पृष्ठ 83-84
[2] शास्त्री,अजय मित्र, इन्स्क्रिप्शन ऑफ शरभपुरीय,पांडुवंशीन्स एंड सोमवंशीन्स, वॉल्यूम 2,1995, पृष्ठ 376-379
[3] वही, पृष्ठ 376-379
[4] वही, पृष्ठ 376-379
[5] वही, पृष्ठ 376-379
[6] वही, पृष्ठ 376-379
[7] वही, पृष्ठ 376-379
[8] वही, पृष्ठ 376-379
[9] वही, पृष्ठ 378 (सेट 7)
[10] वही, पृष्ठ 376 (सेट 1)
[11] तिवारी, सुजीत कुमार, उपरोक्त, पृष्ठ 80
[12] शास्त्री, अजय मित्र, पूर्वोक्त , पृष्ठ 378-79
[13] वही, पृष्ठ 376
[14] वही, पृष्ठ 378-79
[15] बोसमा, नतासा, दक्षिण कोसल : ए रीच सेंटर ऑफ अर्ली शैविज्म, 2018, पृष्ठ 255
[16] जैन, बालचंद्र, उत्कीर्ण लेख, 1961, पृष्ठ 213-14
[17] तिवारी, सुजीत कुमार, उपरोक्त, पृष्ठ 81
[18] शास्त्री, अजय मित्र, पूर्वोक्त, पृष्ठ 378-79
[19] तिवारी, सुजीत कुमार, पूर्वोक्त, पृष्ठ 82
[20] शास्त्री, अजय मित्र, पूर्वोक्त , पृष्ठ 154-155;एपिग्राफिया इंडिका, भाग 31, पृष्ठ 31-36
[21] वही, पृष्ठ 154-155;एपिग्राफिया इंडिका, भाग 31, पृष्ठ 31-36
[22] तिवारी, सुजीत कुमार, उपरोक्त, पृष्ठ 82
लेखक – डॉ. सुजीत कुमार तिवारी
पोस्ट डॉक्टोरल फेलो (ICSSR)
प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
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