कुंभ मेले का आयोजन भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है, जिसमें सनातन परंपरा के विभिन्न साधु-संन्यासी एकत्र होते हैं,अखाड़ों का इतिहास प्राचीन है, इसकी स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की थी,शंकराचार्य ने दशनामी परंपरा के अंतर्गत संन्यासी अखाड़ों की स्थापना की, जो न केवल आध्यात्मिक बल्कि शारीरिक रक्षा में भी निपुण थे।
आजाद भारत में आयोजित पहले कुंभ मेले में भगदड़ के कारण अनेक लोगों की जान गई जिस कारण सरकार ने कुंभ के आयोजन हेतु एक अखाड़ा परिषद का स्थापना 1954 में किया, कुंभ में अखाड़ों का विशेष महत्व होता है, इनका उद्देश्य अखाड़ों के मध्य एकता स्थापित करना और उनकी परंपराओं को संरक्षित करना होता है, आइए जानते है कि अखाड़े बनते कैसे हैं, प्रत्येक अखाड़ा अपने दो-दो सदस्यों को अखाड़ा परिषद के सदस्य के रूप में मनोनीत करता है. इस प्रकार सभी 13 अखाड़ों के कुल 26 सदस्य अपने बीच से अध्यक्ष, महामंत्री, कोषाध्यक्ष, उपाध्यक्ष, मंत्री और प्रवक्ता का चुनाव करते हैं. परिषद का चुनाव हर पांच वर्ष पर होता है.वर्तमान में अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी (निरंजनी अखाड़ा) हैं। कुंभ में इन अखाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है | जैसे -अखाड़े पवित्र स्नान, छावनी प्रवेश और धार्मिक गतिविधियों में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, गौरतलब है की शाही स्नान के दौरान अखाड़ों का अनुक्रम निर्धारित होता है, जिसमें सबसे पहले जूना अखाड़ा स्नान करता है। महाकुंभ में अखाड़ों की उपस्थिति एकता, शक्ति, और आस्था का प्रतीक है, जो भारतीय समाज को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करती है |
वर्तमान में 13 अखाड़े हैं और ये मुख्यतया तीन श्रेणियों में विभाजित हैं।
- शैव अखाड़े (इसके तहत कुल सात अखाड़े हैं. शिव और उनके अवतारों को मानते हैं)
1.महानिर्वाणी अखाड़ा…… 748 ई. में स्थापित, इष्टदेव कपिल मुनि, कनखल, हरिद्वार
2.जूना अखाड़ा ……………….शैव संप्रदाय का सबसे बड़ा अखाड़ा,बाबा हनुमान घाट, वाराणसी
3.निरंजनी अखाड़ा…………….903 ई. में स्थापित, इसके साधुओं का शिक्षा स्तर उच्च है,दारागंज, प्रयागराज
4.आवाह्न अखाड़ा……………..स्थापना 547 ई. में,दशाश्वमेध घाट, वाराणसी
5.अटल अखाड़ा…………………646 ई. में वाराणसी में स्थापित
6.आनंद अखाड़ा………………….स्थापना 856 ई. में,त्रयंबकेश्वर, नासिक
7.अग्नि अखाड़ा……………………..इनके इष्ट देव गायत्री हैं,गिरीनगर, भवनाथ, जूनागढ़, गुजरात
- वैष्णव अखाड़े (यह विष्णु के उपासक हैं)
1.निर्मोही अखाड़ा…….14वीं शताब्दी में रामानंदाचार्य द्वारा स्थापित,धीर समीर मंदिर बंसीवट,वृंदावन
2.निर्वाणी अखाड़ा………स्थापना 748 ई. में,हनुमान गढ़ी, अयोध्या
3.दिगंबर अखाड़ा…….शामलाजी खाक चौक मंदिर, सांभर कांथा, गुजरात
- सिख-शैव अखाड़े
1.बड़ा उदासीन अखाड़ा…….1825 में हरिद्वार में स्थापित,कृष्णनगर, कीडगंज, प्रयागराज
2.नया उदासीन अखाड़ा…….1846 में हरिद्वार के कनखल में स्थापित।
3.निर्मल अखाड़ा……1862 में बाबा मेहताब सिंह महाराज द्वारा स्थापित, कनखल, हरिद्वार, उत्तराखंड
अखाड़े के अंदर कौन-कौन से पद होते हैं ?
जब अखाड़ों की ताकत बढ़ी, तो महामंडलेश्वर बनाए गए,आध्यात्मिक प्रमुख को महामंडलेश्वर कहा जाता है, अखाड़े का प्रबंधन करने वाली प्रशासनिक संस्था को पंच कहा जाता है, इसमें पांच व्यक्ति शामिल होते हैं और महंत सदस्य होते हैं. महंत से नीचे के रैंक में कारबारी, थानापति, सचवी, पुजारी, कोतवाल और कोठारी शामिल हैं
सभी अखाड़ों के अपने नागा साधु और हठ योगी होते हैं. अखाड़े सीधे संन्यासी नहीं बनाते, संन्यासी बनने से पहले उन्हें एक मढ़ी (दीक्षा केंद्र) में नामांकित होना पड़ता है, ये मढ़ी ही मिलकर एक अखाड़ा बनाते हैं । इस दौरान इन्हें भिक्षुओं की भांति जीवन यापन करना होता है, मढ़ी (दीक्षा केंद्र) के इन भिक्षुओं को उनकी आध्यात्मिक प्रगति के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है, जैसे – कुटीचक, बहुदक, हंस और परमहंस एक कुटीचक तपस्वी जंगल में रहने के लिए दुनिया को त्याग देता है, वह यात्रा नहीं कर सकता या भीख नहीं मांग सकता, बहुदक भटकने वाला भिक्षु है जो तीन दिनों से अधिक एक स्थान पर नहीं रह सकता । वह वस्तुओं के रूप में भिक्षा एकत्र करता है और नकद स्वीकार नहीं कर सकता ।
2013 के कुंभ में 12 साल की तपस्या पूरी करने वाली कई महिला तपस्वियों को दीक्षा दी गई थी । इसके बाद महिलाओं का संन्यासिन अखाड़ा अस्तित्व में आया, किन्नर अखाड़ा 2016 के उज्जैन कुंभ में सामने आया, 2019 के कुंभ मेले में किन्नर अखाड़े के बैनर तले लगभग 2,000 संन्यासी और साधुओं ने भाग लिया । आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण ने ट्रांसजेंडरों को एकजुट करने सनातन धर्म में ट्रांसजेंडरों की स्थिति के बारे में लोगों के बीच संदेश फैलाने के लिए अखाड़े की स्थापना की थी. 2019 में उन्हें जूना अखाड़े का हिस्सा बना दिया गया,
दशनामी नागा संन्यासी का इतिहास में लेखक जदुनाथ सरकार ने 8वीं सदी में मौजूद साधुओं के दस समूहों का जिक्र किया है. इनके नाम हैं – गिरि, पुरी, भारती, बान, अरण्य, पर्वत, सागर, तीर्थ, आश्रम और सरस्वती. इन समूहों को आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों से जोड़ा गया .पुरी, भारती और सरस्वती शाखाएं शृंगेरी मठ (दक्षिण) से जुड़ी थीं, जबकि बान और अरण्य जगन्नाथ पुरी (पूर्व) में गोवर्धन मठ के साथ जुड़े थे, गिरि, पर्वत और सागर को जोशी मठ (उत्तर) से, जबकि तीर्थ और आश्रम शाखाओं को द्वारका (पश्चिम) में शारदा मठ को सौंपा गया।
Writer- प्रियंका मिश्रा, शोधार्थी
