लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास: एक कालजयी व्यक्तित्व

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के आकाश के वह जाज्वल्यमान सूर्य हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से न केवल राम-कथा को जन-जन तक पहुँचाया, बल्कि मध्यकालीन भारत में भक्ति और मर्यादा का एक नया आदर्श स्थापित किया। उनके द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ आज भी भारतीय संस्कृति का आधार स्तंभ माना जाता है। जन्म और प्रारंभिक जीवन : तुलसीदास जी के जन्म के समय और स्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद है, परंतु अधिकांश विद्वान उनका जन्म संवत् 1589 (1532 ईस्वी) के आसपास मानते हैं। उनके जन्मस्थान के रूप में उत्तर प्रदेश के चित्रकूट…

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Mimaṃsa Principles in Modern Indian Statutory Law

Writer – Ujjawal MA Hindu studies ( university of delhi) INTRODUCTION Mīmāṃsā one of six orthodox darśanas (schools of Indian philosophy) whose original purpose was to reconcile contradictory Vedic injunction (vidhi), to arbitrate between ritual and duty as described in Jaimini’s Mīmāṃsā Sūtra (600-400 BCE) and later in the interpretations of Śabara (5th century CE), Kumārila Bhaṭṭa and Prabhākara, systematises rules such as reconciling contradictory texts, preferring the intention, and preferring a given term. These rules are not directly applicable to contemporary Indian statutory law; but nevertheless form a “constitutional-style”…

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Ardhanārīśvara – The Divine Union of Shiva and Shakti 

Abstract The concept of Ardhanārīśvara, the half-male and half-female form of Lord Shiva and Goddess Pārvatī, probably is one of the most greatest ideas ever to originate in Bhartiya philosophy; it represnts the universal balance between masculine and feminine powers. This paper will try to discover the Philosophical, textual, and symbolism factors of the concept Ardhanārīśvara and its relevance to the modern world.  The concept traces its origin back to early Hindu scriptures, specifically the Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, Shiva Purāṇa and Ardhanarishvara strotam by Adi Guru Shankaracharya where the concept of…

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ऋग्वेद और मनुस्मृति में द्यूत (जुआ): धार्मिक, नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण

सारांश आज की वर्तमान परिस्थिति को देखकर प्राचीन समय में लोगों का धार्मिक, नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण कैसा रहा होगा उसका बीज वैदिक साहित्य में और स्मृति ग्रंथों में दृष्टिगत होता है, प्राचीन समय में जुआ के बारे में निकृष्ट बाते कही जाती रही है। प्रस्तावना: वैदिक काल से ही भारत में मनुष्य के जीवन की अनेक समस्याओं और उनके निवारण के उपाय वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों, उपनिषदों, पुराणों, रामायण और महाभारत जैसे स्मृति ग्रंथों में निहित हैं। इन्हें जानकर व्यक्ति समस्याओं से मुक्त होकर एक सुचारु जीवन जी सकता…

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15 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला

भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति विचार और संस्थाएं भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित 10 अगस्त से 31 अगस्त 2026 Link – https://forms.gle/A9aTvrvAFpYZUJDX7

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रामायण की मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना की समीक्षा

शोध सार यह शोध पत्र रामायण की मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना की आलोचनात्मक समीक्षा करता है। मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग- संघर्ष और अर्थ आधारित अधिरचना की अवधारणाओं पर आधारित है जो ग्रंथों को प्रायः वैचारिक और सत्ता संबंधी उत्पाद के रूप में देखता है। इसी दृष्टि से रामायण को सामंती प्रभुत्व, जातिगत संरचना और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के रूप में स्वीकार करता है। यह लेख समीक्षा करता है कि, मार्क्सवादी पद्धति भारतीय काव्य शास्त्रीय उपकरणों (यथा शब्द- शक्ति, रस, ध्वनि, प्रसंग आदि) की उपेक्षा करते हुए केवल शब्दों के भावार्थों…

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प्रिय पाठकों

सुमित राय

भारतीय ज्ञान-परंपरा का स्वरूप मूलतः किसी एक कर्ता, कालखंड अथवा सत्ता-संरचना से आबद्ध नहीं रहा है। यह परंपरा अपौरुषेयता के उस बोध से विकसित हुई है, जिसमें ज्ञान को मानव-निर्मित उत्पाद न मानकर एक सतत अन्वेषणशील चेतना के रूप में देखा गया है। इसी कारण भारतीय बौद्धिक परंपरा न तो इतिहास में बंद हु़ई है और न ही भूगोल में सीमित रही है, वह समय, समाज और संदर्भों के पार एक जीवंत वैचारिक प्रवाह के रूप में निरंतर विकसित होती रही है।अनन्त अनादि इसी सतत ज्ञान-प्रवाह के समकालीन पुनर्पाठ का…

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जनजातीय समाज में त्यौहार और उत्सव संबंधी परंपराएँ

प्रस्तावना भारत विविध संस्कृतियों, परंपराओं और जीवन-शैलियों का देश है। यहाँ अनेक प्रकार की जनजातियाँ निवास करती हैं, जिनकी अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान, भाषा, विश्वास और जीवन-पद्धति है। जनजातीय समाज का जीवन प्रकृति से गहरे रूप से जुड़ा हुआ है। उनके त्यौहार, उत्सव और परंपराएँ प्रकृति, कृषि, ऋतु परिवर्तन और सामुदायिक जीवन से सीधे जुड़े होते हैं। जनजातीय समाज में त्यौहार केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, बल्कि यह सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक विश्वास का महत्वपूर्ण माध्यम होते हैं। इन त्यौहारों के माध्यम से जनजातीय लोग प्रकृति के…

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