ऋग्वेद और मनुस्मृति में द्यूत (जुआ): धार्मिक, नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण

सारांश

आज की वर्तमान परिस्थिति को देखकर प्राचीन समय में लोगों का धार्मिक, नैतिक और सामाजिक दृष्टिकोण कैसा रहा होगा उसका बीज वैदिक साहित्य में और स्मृति ग्रंथों में दृष्टिगत होता है, प्राचीन समय में जुआ के बारे में निकृष्ट बाते कही जाती रही है।

प्रस्तावना:

वैदिक काल से ही भारत में मनुष्य के जीवन की अनेक समस्याओं और उनके निवारण के उपाय वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, आरण्यकों, उपनिषदों, पुराणों, रामायण और महाभारत जैसे स्मृति ग्रंथों में निहित हैं। इन्हें जानकर व्यक्ति समस्याओं से मुक्त होकर एक सुचारु जीवन जी सकता है। इन्हीं विभिन्न समस्याओं में से एक समस्या है ‘द्यूत’ (जुआ)। इस द्यूतरूपी दोष को दूर करने के लिए ऋग्वेद और मनुस्मृति में दिए गए उपायों का वर्णन करने का यहाँ प्रयास किया गया है, ताकि व्यक्ति अपने जीवन को सुचारु और व्यसनमुक्त बना सके।

ऋग्वेद के अनुसार:

  • व्यक्ति द्यूत (जुए) के व्यसन से मुक्त हो।
  • द्यूतरूपी दुष्कर्म का त्याग करे।
  • द्यूत को छोड़कर सन्मार्ग पर चले।
  • दुर्गुणों को छोड़कर सद्गुण अपनाए।

ऋग्वेद:

दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद माना जाता है। इसमें द्यूत (जुए) के विषय में यहाँ अक्षसूक्त की बात की गई है। जुआ व्यक्ति के जीवन को कितना नष्ट कर सकता है, इसकी बात यहाँ स्पष्ट शब्दों में की गई है।

पाँसों का आकर्षण:

पाँसे जुआरी को उस तरह आकर्षित करते हैं जैसे काम से संतप्त नारी अपने पति के पास जाती है। वैसे ही पाँसों के आकर्षण से मोहित व्यक्ति जुआरी के घर (अड्डे) जाता है।¹ जब जुआरी पाँसों को यहाँ-वहाँ चलते देखता है, तब उसे बहुत आनंद आता है।² पाँसे जुआरी में इतना आकर्षण और मोह उत्पन्न करते हैं कि वह सुंदर सुशील पत्नी को छोड़कर जुआ खेलने चला जाता है।³ पाँसों का आकर्षण बहुत कठिन होता है।⁴ जुआरी विचार करता है कि “मैं पाँसे कभी नहीं खेलूँगा” परंतु वह इसके मोह से मुक्त नहीं हो पाता⁵ और अपनी छाती फुलाकर, कूदकर जुए के अड्डे पर आता है और कहता है कि “मैं जीतूँगा”। परंतु पाँसे कभी उसकी इच्छा पूरी नहीं करते हैं और कभी विपक्षी की इच्छा पूरी करते हैं।⁶ जो जुआरी जुआ जीतता है, उसके लिए पाँसे पुत्र-जन्म के समान आनंद देते हैं। वह मधुरिमा से युक्त हो जाता है और मानो मीठे वचनों से संवाद करता है।⁷ पाँसे किसी के वश में नहीं आते, राजा भी पाँसों को नमस्कार करता है।⁸ नमन्ते राजा चिदेभ्यो नम इत्कृणोति इस प्रकार पाँसों का मोह जुआरी को खींच ले जाता है।

द्यूत (जुआर) द्वारा मिलने वाले दुःख :

जुआ खेलने वाले व्यक्ति और उसके परिवार को अनेक प्रकार के दुःख प्राप्त होते हैं। उसकी पत्नी दीन-हीन वेश में दुःख भोगती है, उसका पुत्र भी कहाँ-कहाँ भटकता है यह जानकर उसकी माता दुखी होती है, साथ ही जो जुआरी को धन देता है,वह भी मन में सोचता है कि मेरे पैसे वापस देगा या नहीं?।⁹ अन्य जायां परि मृशन्त्यस्य ¹⁰ जुआरी की पत्नी व्यभिचारिणी बनती है और पाँसे हारे हुए जुआरी को मार डालते हैं।¹¹ पाँसे स्पर्श करने पर ठंडे लगते हैं परंतु हृदय को जलाते हैं। शीताः सन्तो ह्रदयं निर्दहन्ति ¹² द्वेष्टि श्वश्रूरप जाया रुणद्धि ¹³ जुआरी की सास उसकी निंदा करती है और उसकी पत्नी उसे छोड़ देती है। जैसे वृद्ध घोड़े को कोई नहीं खरीदता, वैसे ही जुआरी का कोई आदर नहीं करता।

अपनी पत्नी की दशा देखकर जुआरी का हृदय रोता है। अन्य स्त्रियों के सौभाग्य और सुंदरता को देखकर वह दुखी होता है। जो जुआरी सुबह काले घोड़े पर सवार था, वह शाम के समय गरीब बन जाता है और वस्त्र भी उसके शरीर पर बचते नहीं हैं।

द्यूत (जुआ) छोड़ने के उपाय:

जुआरी को जुआ न खेलने के लिए ऋग्वेद में निहित अवगुणों को दिखाकर कहा गया है कि-

अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः।

तत्र गावः कितव तत्र जाया तन्मे वि चष्टे सवितायमर्यः॥ ¹⁴

जुआरी को जुआ नहीं खेलना चाहिए बल्कि खेती करनी चाहिए। खेती से जो लाभ प्राप्त हो उसी में संतोष और संतुष्टि माननी चाहिए। इस मार्ग से तुम्हें पत्नी और बहुत सी गौएँ (संपत्ति) मिलेंगी, ऐसा भगवान सूर्यदेव ने मुझसे कहा है। मनुस्मृति के ९वें अध्याय के २२० से २२४ श्लोक में मनु ऋषि ने जुए के बारे में वर्णन किया है। उन्होंने जुए को अपने राज्य में खेलने पर प्रतिबंध लगाया था और जुए के अड्डों का सख्त विरोध किया था।

द्यूतं समाह्वयं चैव राजा राष्ट्रान्निवारयेत्।

राजान्तकरणावेतौ द्वौ दोषौ पृथिवीक्षिताम्॥ ¹⁵

राजा को अपने राज्य से द्यूत (जुआ) को दूर करना चाहिए क्योंकि यह दोष राज्य को नष्ट कर देता है। द्यूत कर्म को चोरी के साथ जोड़ते हुए मनु कहते हैं कि यह प्रत्यक्ष चोरी करने के समान है। इसलिए इसे रोकने के लिए राज्य को हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए। यह आज की बात नहीं है, पूर्वकाल से ही द्यूत (जुआ) बड़े विरोध का कारण बना है, इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को हँसी-मजाक में भी जुए का सेवन नहीं करना चाहिए।¹⁶

जुआरी के लिए दण्ड:

जो मनुष्य जुआ खेलता है या खिलवाता है, राजा को उसके हाथ काटकर उसे दंडित करना चाहिए।¹⁷ राजा को जुआरी को राज्य से हमेशा के लिए निर्वासित (तड़ीपार) कर देना चाहिए।¹⁸ जो छिपकर जुआ खेलते हैं, उन्हें राजा की इच्छानुसार सजा मिलनी चाहिए।¹⁹

निष्कर्ष:

ऋग्वेद और मनुस्मृति दोनों ग्रंथों में जुए का तिरस्कार किया गया है। जुआ खेलने के नुकसान और व्याधियाँ एक खुशहाल परिवार को भी दुखी कर देती हैं। इसलिए जो प्राप्त हो उसमें संतोष मानकर जीवन व्यतीत करना चाहिए, कभी जुआ नहीं खेलना चाहिए। ऐसा ऋषि को सूर्यदेव ने कहा है।²⁰ मनुस्मृति में जुए की बात समझाते हुए कहा गया है कि पूर्व में जुए के कारण दुखी हुए लोगों के अनेक उदाहरणों द्वारा जाना जा सकता है कि आनंद या मनोरंजन के लिए भी जुआ नहीं खेलना चाहिए। जुआरी को अपने परिवार, पत्नी, पुत्र और माता-पिता के हित के लिए जुआ नहीं खेलना चाहिए, क्योंकि इससे समाज में वह उपहास का पात्र बनता है। समझ-बूझकर जुआ छोड़कर खेती या मेहनत करनी चाहिए।

उपसंहार:

ऋग्वेद और मनुस्मृति दोनों प्राचीन ग्रंथों ने जुए का विरोध किया है। इसलिए मनुष्य को जीवन में कभी भी जुए जैसी लत या व्यसन में नहीं पड़ना चाहिए। जुआ जीवन को मुश्किल में डाल देता है। कई उदाहरणों से सिद्ध होता है कि जुआ केवल दुःख ही देता है, इसलिए इसका कभी स्वीकार नहीं करना चाहिए।

पाद टिप्पणी :

 1. ऋग्वेद 10.34.5 | 2. ऋग्वेद 10.34.1 | 3. ऋग्वेद 10.34.2 | 4. ऋग्वेद 10.34.4 | 5. ऋग्वेद 10.34.5 | 6. ऋग्वेद 10.34.6 | 7. ऋग्वेद 10.34.7 | 8. ऋग्वेद 10.34.8 | 9. ऋग्वेद 10.34.10 | 10. ऋग्वेद 10.34.4 | 11. ऋग्वेद 10.34.7 | 12. ऋग्वेद 10.34.9 | 13. ऋग्वेद 10.34.3 | 14. ऋग्वेद 10.34.13 | 15. मनुस्मृति 9/221 | 16. मनुस्मृति 9/227 | 17. मनुस्मृति 9/224 | 18. मनुस्मृति 9/225 | 19. मनुस्मृति 9/228 | 20. ऋग्वेद 10.34.13

संदर्भ ग्रंथ:

  • ऋग्वेद संहिता (मण्डल-१०, अक्षसूक्त ३४), अनुवादक/संपादक: श्री रामशर्मा आचार्य, प्रकाशन: युग निर्माण योजना, गायत्री परिवार, मथुरा।
  • मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट की मन्वर्थमुक्तावली टीका सहित), शास्त्री, हरगोविंद (१९८२), वाराणसी: चौखम्बा संस्कृत संस्थान।

लेखक

 डॉ वैभव नरेन्द्रभाई शुक्ल

असिस्टेंट प्रोफेसर

तुलनात्मक साहित्य विभाग

वीर नर्मद दक्षिण गुजरात यूनिवर्सिटी,सूरत, गुजरात- भारत

Leave a Comment