गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के आकाश के वह जाज्वल्यमान सूर्य हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से न केवल राम-कथा को जन-जन तक पहुँचाया, बल्कि मध्यकालीन भारत में भक्ति और मर्यादा का एक नया आदर्श स्थापित किया। उनके द्वारा रचित ‘रामचरितमानस’ आज भी भारतीय संस्कृति का आधार स्तंभ माना जाता है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन : तुलसीदास जी के जन्म के समय और स्थान को लेकर विद्वानों में मतभेद है, परंतु अधिकांश विद्वान उनका जन्म संवत् 1589 (1532 ईस्वी) के आसपास मानते हैं। उनके जन्मस्थान के रूप में उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले के राजापुर गांव को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है, जबकि कुछ विद्वान सोरों (कासगंज) को उनका जन्मस्थान मानते हैं। तुलसीदास जी के पिता का नाम आत्माराम दुबे और माता का नाम हुल्सी था। लोक मान्यताओं के अनुसार, तुलसीदास जी का जन्म अत्यंत विलक्षण परिस्थितियों में हुआ था। कहा जाता है कि वे बारह महीने तक गर्भ में रहने के बाद पैदा हुए थे और जन्म के समय उनके मुख में बत्तीस दाँत मौजूद थे। उन्होंने रोने के बजाय ‘राम’ नाम का उच्चारण किया था, जिसके कारण उनका बचपन का नाम ‘रामबोला‘ पड़ा। मूल नक्षत्र में जन्म लेने और इन विचित्रताओं के कारण माता-पिता ने अनिष्ट की आशंका में उन्हें त्याग दिया था।
शिक्षा और दीक्षा : माता-पिता द्वारा त्यागे जाने के बाद, ‘मुनिया‘ नामक एक दासी ने उनका पालन-पोषण किया। मुनिया की मृत्यु के बाद रामबोला अनाथ हो गए और भिक्षाटन कर जीवन व्यतीत करने लगे। इसी कठिन समय में उनकी भेंट स्वामी नरहरिदास से हुई। नरहरिदास जी ने ही बालक रामबोला को अपनाया, उन्हें ‘तुलसीदास’ नाम दिया और उन्हें अयोध्या ले गए। यहीं से उनकी शिक्षा-दीक्षा प्रारंभ हुई। उन्होंने शेष सनातन जी के सान्निध्य में रहकर काशी में वेद, वेदांग, दर्शन, इतिहास और पुराणों का गहन अध्ययन किया।
वैवाहिक जीवन और वैराग्य : तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली नाम की एक विदुषी कन्या से हुआ था। कहा जाता है कि तुलसीदास अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करते थे। एक बार रत्नावली अपने मायके चली गईं और तुलसीदास जी उनके पीछे-पीछे भारी बारिश और उफनती नदी को पार कर आधी रात को ससुराल पहुँच गए। इस पर रत्नावली ने उन्हें फटकारते हुए एक प्रसिद्ध दोहा कहा–
लाज न लागत आपुको, दौरे आयहु साथ।
धिक-धिक ऐसे प्रेम को, कहा कहूँ मैं नाथ॥
अस्थि चर्ममय देह यह, तासों ऐसी प्रीति।
नेकु जो होती राम महँ, तो न होत भवभीति॥
अर्थात्, इस हाड़-मांस के शरीर से जितना प्रेम आप कर रहे हैं, यदि उसका आधा भी प्रभु श्री राम से करते, तो आपका जीवन तर जाता। पत्नी के इन शब्दों ने तुलसीदास के भीतर वैराग्य की ज्वाला जला दी। उन्होंने तत्काल गृहस्थ जीवन त्याग दिया और राम-भक्ति के मार्ग पर निकल पड़े।
साहित्यिक योगदान और रामचरितमानस की रचना -: तुलसीदास जी ने अपना अधिकांश जीवन काशी, अयोध्या और चित्रकूट में व्यतीत किया। संवत् 1631 (1574 ईस्वी) में अयोध्या में उन्होंने अपने कालजयी ग्रंथ ‘रामचरितमानस‘ की रचना प्रारंभ की। उस समय संस्कृत विद्वानों का वर्चस्व था, लेकिन तुलसीदास ने लोकभाषा (अवधी) को माध्यम बनाया ताकि ईश्वर की कथा महलों से निकलकर झोपड़ियों तक पहुँच सके।रामचरितमानस सात कांडों (बालकांड, अयोध्या कांड, अरण्य कांड, किष्किंधा कांड, सुंदर कांड, लंका कांड और उत्तर कांड) में विभाजित है। इसमें उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के आदर्श चरित्र के माध्यम से समाज को नैतिकता, धैर्य, और भक्ति का पाठ पढ़ाया।
उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ
1. विनय पत्रिका: इसमें तुलसीदास जी की दैन्य भक्ति और प्रभु के प्रति समर्पण के भाव देखने को मिलते हैं।
2. कवितावली: इसमें ब्रजभाषा में रामकथा का वर्णन है।
3. दोहावली: इसमें नीति और भक्ति से संबंधित दोहों का संग्रह है।
4. गीतावली: पदों के रूप में रामकथा।
5. हनुमान चालीसा: यह आज भी हिंदू धर्म में सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला स्तोत्र है।
6. जानकी मंगल और पार्वती मंगल: भगवान राम और शिव के विवाह प्रसंगों पर आधारित।
दार्शनिक और सामाजिक दृष्टिकोण -: तुलसीदास जी केवल एक कवि नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक और समन्वयवादी थे। उस समय समाज में शैव और वैष्णव संप्रदायों के बीच मतभेद थे। तुलसीदास ने राम के मुख से यह कहलवाया—
शिव द्रोही मम दास कहावा,
सो नर मोहि सपनेहुँ नहि पावा
(जो शिव का द्रोह करता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मुझे सपने में भी नहीं पा सकता)। इस प्रकार उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों और विचारधाराओं को जोड़ने का कार्य किया। उनका रामराज्य का सिद्धांत आज भी एक आदर्श शासन व्यवस्था का प्रतीक माना जाता है, जहाँ प्रजा सुखी हो और सर्वत्र शांति हो।
व्यक्तित्व और चमत्कार -: लोक कथाओं में तुलसीदास जी के जीवन से जुड़े कई चमत्कारों का वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि उन्हें चित्रकूट के घाट पर भगवान राम और लक्ष्मण के साक्षात् दर्शन हुए थे, जिसमें हनुमान जी ने उनकी सहायता की थी। यह प्रसंग इस दोहे में अमर है–
चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर।
तुलसीदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥
मृत्यु -: तुलसीदास जी ने अपना अंतिम समय काशी के अस्सी घाट पर व्यतीत किया। संवत् 1680 (1623 ईस्वी) में सावन के महीने में उन्होंने अपना नश्वर शरीर त्याग दिया। उनकी मृत्यु के संबंध में एक पद प्रचलित है-
संवत् सोरह सौ असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर॥
संत तुलसीदास हिंदी साहित्य के ऐसे अनमोल रत्न हैं जिन्होंने अपनी लेखनी से भारतीय समाज को एक सूत्र में पिरोया। रामचरितमानस के रूप में उन्होंने एक ऐसी जीवन-संहिता दी है जो सदियों से मानवता का मार्गदर्शन कर रही है। उनका साहित्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना वह सोलहवीं शताब्दी में था। वे सही मायनों में लोकनायक थे, जिन्होंने भक्ति को ज्ञान और कर्म के साथ जोड़कर जन-साधारण के लिए सुलभ बनाया।
सुशी सक्सेना, इंदौर मध्यप्रदेश
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