शोध सार यह शोध पत्र रामायण की मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना की आलोचनात्मक समीक्षा करता है। मार्क्सवादी साहित्यिक आलोचना ऐतिहासिक भौतिकवाद, वर्ग- संघर्ष और अर्थ आधारित अधिरचना की अवधारणाओं पर आधारित है जो ग्रंथों को प्रायः वैचारिक और सत्ता संबंधी उत्पाद के रूप में देखता है। इसी दृष्टि से रामायण को सामंती प्रभुत्व, जातिगत संरचना और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के रूप में स्वीकार करता है। यह लेख समीक्षा करता है कि, मार्क्सवादी पद्धति भारतीय काव्य शास्त्रीय उपकरणों (यथा शब्द- शक्ति, रस, ध्वनि, प्रसंग आदि) की उपेक्षा करते हुए केवल शब्दों के भावार्थों…
Read MoreAuthor: Sumit Rai
प्रिय पाठकों
भारतीय ज्ञान-परंपरा का स्वरूप मूलतः किसी एक कर्ता, कालखंड अथवा सत्ता-संरचना से आबद्ध नहीं रहा है। यह परंपरा अपौरुषेयता के उस बोध से विकसित हुई है, जिसमें ज्ञान को मानव-निर्मित उत्पाद न मानकर एक सतत अन्वेषणशील चेतना के रूप में देखा गया है। इसी कारण भारतीय बौद्धिक परंपरा न तो इतिहास में बंद हु़ई है और न ही भूगोल में सीमित रही है, वह समय, समाज और संदर्भों के पार एक जीवंत वैचारिक प्रवाह के रूप में निरंतर विकसित होती रही है।अनन्त अनादि इसी सतत ज्ञान-प्रवाह के समकालीन पुनर्पाठ का…
Read Moreजनजातीय समाज में त्यौहार और उत्सव संबंधी परंपराएँ
प्रस्तावना भारत विविध संस्कृतियों, परंपराओं और जीवन-शैलियों का देश है। यहाँ अनेक प्रकार की जनजातियाँ निवास करती हैं, जिनकी अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान, भाषा, विश्वास और जीवन-पद्धति है। जनजातीय समाज का जीवन प्रकृति से गहरे रूप से जुड़ा हुआ है। उनके त्यौहार, उत्सव और परंपराएँ प्रकृति, कृषि, ऋतु परिवर्तन और सामुदायिक जीवन से सीधे जुड़े होते हैं। जनजातीय समाज में त्यौहार केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, बल्कि यह सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक विश्वास का महत्वपूर्ण माध्यम होते हैं। इन त्यौहारों के माध्यम से जनजातीय लोग प्रकृति के…
Read Moreहिमालयी सीमाओं के मौन वास्तुकार: रियाज़ डीन की मैपिंग द ग्रेट गेम के आलोक में भारतीय पंडित सर्वेक्षकों का पुनर्मूल्यांकन
सारांश हिमालय की मानचित्रण-परंपरा का इतिहास अधिकांश ब्रिटिश सर्वेक्षकों के कार्यों पर केंद्रित रहता है, जबकि भारतीय पंडित सर्वेक्षकों के प्रयासों को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। रियाज़ डीन की पुस्तक मैपिंग द ग्रेट गेम (2019) का उपयोग करते हुए यह लेख तिब्बत और हिमालयी सीमांत के अन्वेषण एवं मानचित्रण में पंडितों की भूमिका को समझने का प्रयास है। इसमें तर्क दिया गया है कि हिमालयी मानचित्रण की सफलता को उनके महत्त्वपूर्ण योगदानों को स्वीकार किए बिना नहीं समझा जा सकता। यद्यपि ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे ने आधिकारिक ढाँचा प्रदान…
Read MoreSarve Bhavantu Sukhinah and Lokamaṅgala as an Indigenous Public Administrative Paradigm
Abstract The concept of the Pursuit of Happiness, as expressed within the American constitutional framework, has significantly shaped contemporary political discourse by emphasizing individual freedom and personal welfare as fundamental goals of governance. Nevertheless, the increasing crises of the twenty-first century, such as armed conflicts, growing inequalities, climate instability, social disintegration, and diminishing public confidence in institutions have revealed the shortcomings of governance models that primarily focus on individual ambitions. These issues prompt a renewed exploration of alternative normative frameworks that can harmonize individual welfare with collective interests. This paper…
Read Moreकठोपनिषद का संचार-शास्त्रीय विश्लेषण – अंतर्वैयक्तिक, पारस्परिक और परा-संचार के विविध आयाम
शोध-सार कठोपनिषद मात्र एक आध्यात्मिक या दार्शनिक ग्रंथ नहीं है, अपितु यह मानव चेतना और संचार-प्रक्रिया का एक अत्यंत परिष्कृत मैनुअल है। यह शोध पत्र कठोपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा) में निहित यम-नचिकेता संवाद का आधुनिक संचार सिद्धांतों के आलोक में विश्लेषण करता है। जहाँ पश्चिमी संचार मॉडल (जैसे शैनन-वीवर का SMCR मॉडल) सूचना के भौतिक हस्तांतरण तक सीमित हैं, वहीं कठोपनिषद चेतना के हस्तांतरण पर बल देता है। यह अध्ययन अन्वेषण करता है कि कैसे उपनिषद में अंतर्वैयक्तिक संचार रथ रूपक के माध्यम से, (पारस्परिक संचार – गुरु-शिष्य…
Read Moreअखाड़ा परिषद: एकता और धर्म का संगम
कुंभ मेले का आयोजन भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है, जिसमें सनातन परंपरा के विभिन्न साधु-संन्यासी एकत्र होते हैं,अखाड़ों का इतिहास प्राचीन है, इसकी स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की थी,शंकराचार्य ने दशनामी परंपरा के अंतर्गत संन्यासी अखाड़ों की स्थापना की, जो न केवल आध्यात्मिक बल्कि शारीरिक रक्षा में भी निपुण थे।आजाद भारत में आयोजित पहले कुंभ मेले में भगदड़ के कारण अनेक लोगों की जान गई जिस कारण सरकार ने कुंभ के आयोजन हेतु एक अखाड़ा परिषद का स्थापना 1954 में किया, कुंभ में अखाड़ों का विशेष महत्व होता है,…
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